भारत के सरकारी कर्मचारियों के लिए आम धारणा है कि ये लोग जल्दी कोई फैसला नहीं ले पाते और दिन ब दिन फ़ाइलों पर धूल की परत चढ़ती जाती है.
सरकार के किसी विभाग में कोई भी एक टीम के रूप में काम नहीं कर पाता है.
अब केंद्र सरकार इस धारणा को बदलने के लिए अपने कर्मचारियों को हिमाचल में रॉक क्लाइम्बिंग और गोवा में बीच हाइकिंग कराने के लिए भेजने पर विचार कर रहे हैं.
लेकिन इस योजना को लेकर कई आला अफ़सरों में ही संदेह है.
एक अधिकारी ने कहा कि सरकारी अफ़सरों को किसी तरह के जोख़िम में डालने की बात नहीं की जानी चाहिए.
भारत सरकार में कैबिनिट सचिव रह चुके और देश के सरकारी अमले को लेकर किताब लिखने वाले टीएसआर सुब्रमण्यम ने बीबीसी से कहा कि सरकारी काम के लिए प्रेरित करने और एडवेंचर के लिए प्रेरित करने में अंतर है.
उन्हें इस बात पर भरोसा नहीं है कि एडवेंचर से सरकारी काम में कोई प्रेरणा मिल सकती है.
लेकिन हां, राष्ट्रपति कैनेडी हर किसी को दौड़ लगाने के लिए कहते थे और खुद भी दौड़ते थे.
सरकारी कर्मचारियों का शारीरिक तौर पर फिट रहना बेहद ज़रूरी है. सरकार कहना है कि इस योजना में सरकार प्रति कर्मचारी 20,000 रुपये खर्च वहन करेगी.
भारतीय कर दाताओं के धन की नियमित पड़ताल करने वाली संस्था इंडियन टैक्सपेयर एसोसिएशन ने सरकार के इस क़दम का स्वागत किया है.
संस्था के अध्यक्ष शांता कुमार को लगता है कि इस तरह की गतिविधियों से कर्मचारियों में एक टीम की तरह काम करने की प्रवृत्ति पैदा होगी.
वस्तुतः एक सरकारी कर्मचारी के कार्यकाल में ट्रेनिंग के लिए धन अलॉट होता है, लेकिन उसे आमतौर पर खर्च नहीं किया जाता है.
इसलिए कर्मचारी कोई भी फैसला लेने से डरते हैं और इस तरह उनमें जोख़िम न लेने का स्थाई भाव पैदा हो जाता है.
पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव अर्द्धेंदु सेन इस पूरे मामले को लेकर बहुत उत्साहित नहीं हैं लेकिन वो नौकरशाहों में जोख़िम लेने की प्रवृत्ति न होने से इंकार भी नहीं करते.
वो कहते हैं, “नौकरशाहों को जोख़िम लेने के लिए प्रोत्साहित करना अच्छी बात है, जिस व्यवस्था में हम काम करते हैं, वहां हमें जोख़िम लेने को हतोत्साहित किया जाता है और इसकी सज़ा भी मिलती है.”
सेन कहते हैं कि नौकरशाह आजकल प्राइवेट सेक्टर के साथ साझेदारी में काम करना सीख रहे हैं. सरकार जोख़िम लेने का काम निजी क्षेत्र पर छोड़ सकती है.
दूसरी तरफ़ टीम भावना को प्रेरित करना सही है, लेकिन इसमें भी बहुत समस्याएं हैं.
उनका कहना है अगर 15 दिन के एडवेंटर स्पोर्ट्स से टीम भावना विकसित किया जा सकता है तो फिर पीछे एक सौ या दो सौ साल से हम क्या कर रहे थे.
सेन की मानें तो इसके बदले नौकरशाहों को दूसरों के विचारों और सलाह को सम्मान और महत्व देना सिखाना होगा. ये काम 15 दिन में नहीं हो सकता.
दिल्ली में कई सरकारी विभागों के लिए कंसल्टेंट का काम करने वाले देवाशीष भट्टाचार्य को भी इस योजना को लेकर कई संदेह हैं.
वो कहते हैं, “पर्वतारोहण, ट्रेकिंग, पैराग्लाइडिंग करके टीम भावना नहीं पैदा की जा सकती. देखा जाए तो लोग तभी टीम भावना में काम करते हैं, जब लोगों की ज़िम्मेदारी, भूमिका और दायित्व बिल्कुल स्पष्ट हो और हर कर्मचारी की जवाबदेही तय हो. वो जो काम कर रहा है उस काम के लिए पूरी तरह से ज़िम्मेदार हो.”
भारत की गैर सरकारी संस्थाओं और कार्पोरेट कंपनियों में अपने कर्मचारियों को एडवेंचर एक्टिविटी के लिए बाहर भेजने का चलन पिछले कुछ दिनों से आम हो गया है.
लेकिन सरकारी हमकमे में यह योजना कितनी कारगर हो पाएगी, इसको लेकर कई तबकों में आशंकाएं बनी हुई हैं.
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