Tuesday, 15 December 2015

मुझे दो बातों का दुख है: निर्भया की माँ

जो लड़का उस रात (निर्भया के) साथ था, मैं उसके बारे में क्या बात करूं. उसकी अपनी ज़िंदगी है.
इधर एक साल से हमारी कोई बात भी नहीं हुई है.
मैं यही सोचती हूं कि उसकी भी अपनी ज़िंदगी है. जो कुछ उसने अपनी आंखों से देखा, उसे भी कहीं न कहीं तकलीफ़ हुई होगी, दुख होगा.
मैं उसको जानती थी. वो लड़का उस दिन भी मेरी बेटी को बस स्टॉप से लेकर गया था.
Image copyrightGetty
वो फिर मेरी बेटी को बस स्टॉप तक छोड़कर जाता, फिर अपने घर को जाता.
मुझे दो ही चीज़ें याद रहती हैं.
एक तो वो घर से जब गई, गेट पर गई, हाथ हिलाई, बोली बाय मम्मी मैं अभी दो-तीन घंटे में आ रही हूं.
ये शब्द आज भी कान में जैसे गूंजते हैं और उसका घर से निकलना आज भी आंखों के सामने घूम जाता है.
आशा देवी
दूसरा ये दिखता है कि जब सिंगापुर जाने से पहले उसी रात को उसने देखा कि हमें यहां इतने दिन हो गए हैं, भाई से बोली कि मुझे घर ले चलो.
मुझे एक चीज़ तकलीफ़ ये देती है कि जब वो बेहोश हुई तो उसने कहा, कि मम्मी को बुलाओ.
मैं भागकर गई लेकिन मेरे जाते-जाते वो बेहोश हो गई. फिर उसे होश नहीं आया. मुझे ये तकलीफ़ रही है.
वो सोती नहीं थी. वो आंख बंद करती थी तो डरती थी. कहती थी कि मम्मी मुझे डर लग रहा है.
दिल्ली गैंगरेप मामले के अभियुक्तImage copyrightAFP
वो कहती थी कि मेरे पैरों के पास, कभी बगल में कोई खड़ा है. तो मैं बैठती थी, हाथ पकड़ती थी तो वो सोती थी. लेकिन यही दुख रहता है कि जब उसकी आवाज़ बंद हुई, आंख बंद हुई, तब मैं नहीं मिल पाई.
बाकी सब चीज़ें दिमाग में हैं, क्या कह सकते हैं.
निर्भया के पिता
इस साल उनकी श्रद्दांजलि पर एक दोषी छूट गया. उन्हें सच्ची श्रद्दांजलि तभी मिलेगी जब सभी दोषियों को फांसी मिल जाएगी. उनके आखिरी शब्द यही थे कि दोषियों को ज़िंदा जला देना चाहिए.
आगे वक्त बताएगा कि किस तरह की मुश्किलें (ज़िंदगी में) आएंगी और कैसे जिया जाएगा.
समय के साथ आदमी जीता है, चलता है.

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