निर्देशक: रोहित शेट्टी
अभिनेता: शाहरुख़ ख़ान, काजोल, वरुण धवन
रेटिंग: *1/2
अगर आप 'सुपरस्टार' शाहरुख़ से उनकी जन्मजात हाज़िरजबावी, दौलत और मध्य वर्ग से यहां तक पहुंचने वाली प्रेरणादायक कहानी को अलग कर दें, तो आपको पर्दे पर वो कैसे दिखेंगे?
मेरे ख़्याल से एक औसत अक्षय कुमार की तस्वीर नज़र आएगी, जो तीन महीनों में एक बार हमें सिनेमाघरों में दिख जाते हैं.
लेकिन शाहरुख़ ऐसा कुछ करने में माहिर है जो अक्षय कुमार नहीं कर पाते हैं. वजह ये है कि शायद अक्षयजी न तो इंग्लिश मीडियम से पढ़े हैं और न ही मीडिया के साथ इतने घुले मिले हैं.
वहीं, शाहरुख़ अपनी फिल्मों को मुख्यधारा के मीडिया के ज़रिए एक मेगा-इवेंट बना देते हैं. इतना प्रचार होता है तो लोगों की उम्मीदें भी बढ़ जाती हैं और आख़िरकार वो टिकट ख़रीदकर फिल्म की रिलीज़ के पहले वीकेंड पर ही उसे देखने सिनेमाघर में घुस जाते हैं. लेकिन पिक्चर ख़त्म, पैसा हज़म.
कुछ ऐसा ही आलम था उस खचाखच भरे मल्टीप्लेक्स पर, जहां मैं फिल्म देखने गया. मामला पहले आई 'चेन्नई एक्सप्रेस' से कुछ अलग नहीं था.
जहां तक फिल्म की बात है तो ये बेहद घटिया है और कहानी भी दोयम दर्जे की है. इसकी वजह ये है कि फिल्मकार भी जानते हैं कि देखने वाले भी तो यही चाहते हैं- वो इसी लायक है या नहीं, ये मामला अलग है.
आख़िरकार ये फिल्म 'रोहित शेट्टी और उनकी टीम' ने बनाई है. इसका मतलब है कि फिल्म में गोवा की कोई कहानी होगी (जो रामोजीराव या किसी दूसरे स्टूडियो में शूट हुई होगी), और दूसरा, शेट्टी शेट्टी धूम धड़ाका होगा- मतलब महंगी कारें और एसयूवी गाड़ियां हर जगह हवा में उड़ती दिखाई देंगी. (जो बच्चे बड़े हो गए हैं वो तो शायद इसे देख कर पक जाते होंगे.)
तो फिर हम सिनेमा घर में क्यों जाते हैं? एक सेकंड के लिए मैंने सोचा, और चूंकि मुझे पहले से ही ख़बरदार किया गया था कि ये 90 के दशक की मशहूर फिल्म 'हम' (1991) का रीमेक बनने जा रही है.
इसमें अमिताभ वाले रोल में शाहरुख ख़ान हैं जो एक नामी डॉन का वफ़ादार गुर्गा है लेकिन अब उसने अपने रास्ते अलग कर लिए हैं और ख़ून-ख़राबा छोड़ कर वो आम लोगों की नज़र में एक अच्छा इंसान बन गया है.
उसे कभी अपने गैंग के दुश्मन डॉन की बेटी (काजोल) से प्यार हुआ करता था. उन दोनों ने भी अपने रास्ते अलग कर लिए.
अब वो अपने छोटे भाई के साथ रहता है. और छोटे भाई वाला ये किरदार 'हम' में गोविंदा ने निभाया था. यहां वरुण धवन निभा रहे हैं- वैसे भी आज के दौर में गोविंदा वाला किरदार निभाने के लिए वो ही सबसे बढ़िया एक्टर हैं.
लेकिन बात बस यहीं नहीं ख़त्म हो जाती है. असल अभी जो और बचता है, वो तो और समझ से परे है.
शाहरुख़ ख़ान और काजोल फिर एक बार यही ज़ाहिर करते हुए नज़र आते हैं कि वो किसी ज़माने में 'दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे' (1995) में एक सुपरहिट जोड़ी रहे हैं.
ऐसा लगता है कि हम एक बॉलीवुड फिल्म के बारे में दूसरी बॉलीवुड फिल्म देख रहे हैं. हालांकि बुल्गारिया की लोकेशंस बहुत सुंदर दिख रही हैं.
वैसे फिल्म में कई अच्छे एक्टर भी हैं. मसलन बमन ईरानी माफ़िया डॉन बने हैं और वरुण शर्मा वरुण धवन के दोस्त बने हैं. वरुण शर्मा वहीं अपने 'फुकरे' (2013) वाले अंदाज में एक मसखरे की भूमिका में हैं. वो ‘प्यार का पंचनामा’ वाले अंदाज़ में मर्दों की पीड़ा पर दर्द भरी व्यथा पर मोनोलॉग पेश करते हैं.
फिल्म ख़त्म होने के बाद आपके दिमाग में एक सवाल पैदा होता है. क्या ज़रूरत थी इतने करोड़ रुपए लगाने की और एक गीत के ज़रिए फिल्म का इतना ज़्यादा प्रचार करने की.
ऊपर से संजय मिश्रा को जीवन की नकल करते हुए देखने का सिर दर्द अलग. इन सबके बीच साउथ इंडियन मिमिक्री करते हुए जॉनी लीवर भी हैं.
क्या इन सब लोगों को लेकर ही फिल्म बनानी चाहिए थी, नहीं? चलिए, इस बारे में भी सोचा जाएगा जब फिल्म के पहले वीकेंड के बंपर कलेक्शन का आंकड़े आएंगे. फिल्मकारों के लिए तो ये अच्छा है. अपना क्या है?
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