नई दिल्ली। भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवाणी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच तल्खी अब भी बरकरार है। यह गुरुवार को उस वक्त फिर साबित हो गया, जब प्रधानमंत्री मोदी ने श्री आडवाणी से हाथ तो मिलाया पर उनकी तरफ देखा तक नहीं। मोदी बिना देखे ही आगे बढ़ गए। मौका था देश के कद्दावर नेता शरद पवार के जन्मदिन का। दिल्ली में आयोजित अमृत महोत्सव के जलसे में राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष सोनिया गांधी, उपाध्यक्ष राहुल गांधी, सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव सहित देश के शीर्ष नेता इस जलसे में शामिल शरीक रहे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक-एक करके सबसे भेंट की। श्री मोदी ने कतार में खड़े जम्मू काश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला से पहले हाथ मिलाया। उसके बाद मुलायम सिंह यादव का अभिवादन स्वीकार किया। मुलायम सिंह ने प्रधानमंत्री मोदी के कान में कुछ पुâसपुâसाया भी। इसके बाद राहुल गांधी का नंबर आया। उन्होंने बड़ी गर्मजोशी से राहुल गांधी से हाथ मिला और कुशलक्षेम पूछी। राहुल गांधी के बाजू खड़े कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद से भी मोदी जी ने हाथ मिलाया। इसके बाद जेटली ने हाथ जोड़कर मोदी का अभिवादन किया। इसके बाद नंबर आया लालकृष्ण आडवाणी का। प्रधानमंत्री मोदी बिना उनकी तरफ देखे हाथ मिलाया और बगल में खड़े पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल की तरफ मुखातिब होकर बतियाने लगे। मोदी के इस व्यवहार को वैâमरे में तो सभी ने वैâद किया पर सबका ध्यान मोदी और राहुल गांधी की भेंट तक सिमटा रहा। इलेक्ट्रानिक मीडिया में भी इन दोनों के हाथ मिलाने की चर्चा रही पर किसी ने भी आडवाणी के साथ हुए उपेक्षापूर्ण व्यवहार पर गौर नहीं किया।
महीनों बाद ऐसा मौका आया जब आडवाणी और मोदी इतने करीब नजर आए। आडवाणी के आव-भाव से ऐसा लग रहा था कि वे मोदी से कुछ बात करना चाहते हैं लेकिन मोदी ने उनकी तरफ देखा तक नहीं सिर्पâ हाथ मिलाया और आगे बढ़ गए। मोदी का ऐसा रवैया देखकर तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आडवाणी के प्रति वैसी शृद्धा अब मोदी के दिल नहीं रही जो पहले हुआ करती थी। बिहार चुनाव की पराजय के बाद जिस तरह से वरिष्ठ नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ सार्वजनिक रुप से मोर्चा खोला था, शायद उसकी टीस मोदी के मन में गहरे तक बैठ गई है।
महीनों बाद ऐसा मौका आया जब आडवाणी और मोदी इतने करीब नजर आए। आडवाणी के आव-भाव से ऐसा लग रहा था कि वे मोदी से कुछ बात करना चाहते हैं लेकिन मोदी ने उनकी तरफ देखा तक नहीं सिर्पâ हाथ मिलाया और आगे बढ़ गए। मोदी का ऐसा रवैया देखकर तो यह अनुमान लगाया जा सकता है कि आडवाणी के प्रति वैसी शृद्धा अब मोदी के दिल नहीं रही जो पहले हुआ करती थी। बिहार चुनाव की पराजय के बाद जिस तरह से वरिष्ठ नेताओं ने प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के खिलाफ सार्वजनिक रुप से मोर्चा खोला था, शायद उसकी टीस मोदी के मन में गहरे तक बैठ गई है।
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