Wednesday, 2 December 2015

नेपाल में लाखों बच्चों की ज़िंदगी जोखिम में

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संयुक्त राष्ट्र चिल्ड्रेन्स फंड ने चेतावनी दी है कि ठंड की शुरुआत के साथ ईंधन, खाना और दवाइयों की कमी ने नेपाल में तीस लाख नौवजात बच्चों की ज़िंदगी ख़तरे में डाल दी है.
यूनीसेफ का कहना है कि टीकों और एंटीबायोटिक दवाओं की आपूर्ति देश में बहुत कम है और डर है कि बच्चे इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हो सकते हैं.
यूनिसेफ के कार्यकारी निदेशक एंथोनी लेक ने मीडिया को बयान दिया है, "हाइपोथर्मिया और कुपोषण के जोखिम के साथ टीकों और दवाइयों की कमी इस ठंड में जानलेवा हो सकती है."
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ईंधन की कमी की वजह से जलाने वाली लकड़ी पर निर्भरता ने घर के अंदर होने वाले प्रदूषण को बढ़ा दिया है जिससे निमोनिया के मामलों में बढ़ोत्तरी हो सकती है.
पिछले साल नेपाल में पांच साल से कम उम्र के आठ लाख से ज्यादा बच्चों को इन मुसीबतों को झेलना पड़ा था जिसमें 5000 बच्चे मर गए थे.
दवाई दुकानों से टीबी के टीके पूरी तरह ख़त्म हो चुके हैं.
नेपाल की करीब 60 फ़ीसदी दवाइयां भारत से जाती है साथ ही साथ बड़े पैमाने पर ईंधन, खाने-पीने की चीज़ें और दूसरी जरूरत का आयात भी भारत से किया जाता है.
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लेकिन भारत-नेपाल सीमा पर नाकेबंदी ने भारत से जरूरी समानों के आयात को बुरी तरह से प्रभावित किया है.
यह नाकेबंदी नेपाल में हाल में लागू किए गए नए संविधान से नाराज़ मधेसी समुदाय ने कर रखी है.
मधेसी समुदाय का कहना है कि उन्हें संविधान में प्रयाप्त प्रतिनिधित्व नहीं दिया गया है.
नेपाल सरकार ने भारत पर जानबूझ कर हालात ख़राब करने के आरोप लगाए है लेकिन भारत ने इससे इंकार किया है.
यह नाकेबंदी उस वक्त हुई है जब नेपाल इस साल आए भयंकर भूकंप के नुक़सान से उबर नहीं पाया था.
इस भूकंप में क़रीब 9000 लोग मारे गए थे.

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