Tuesday, 29 December 2015

राहुल के लिए अगले छह महीने क्यों अहम हैं?

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28 दिसंबर को अपनी स्थापना के 131वें साल में प्रवेश करने वाले भारत के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस में नेशनल हेरल्ड विवाद के चलते पुराने राजनीतिज्ञों की पकड़ मज़बूत हुई है– जिन्हें 'ओल्ड गार्ड' कहा जाता है.
हाल तक, कांग्रेस के भीतर कई लोग परेशान थे कि कहीं राहुल गांधी पार्टी को अपने अंदाज़ में न बदल दें.
अपनी राजनीतिक सूझबूझ पर गर्व करने वाले कांग्रेस के कई वरिष्ठ नेताओं ने शिकायती लहज़े में कहा कि लंबे अनुभव, निष्ठा और वफ़ादारी के बावजूद राहुल ने उनसे ‘दूरी’ बनाए रखी है.
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लेकिन 19 दिसंबर को कथित नेशनल हेरल्ड घोटाले के मामले में सोनिया और राहुल गांधी को मिली ज़मानत ने पार्टी के भीतर समीकरणों को काफ़ी बदल दिया.
कई ओल्ड गार्ड जैसे मोतीलाल वोरा, ऑस्कर फर्नांडीस, अंबिका सोनी, एके एंटनी, अहमद पटेल, ग़ुलाम नबी आज़ाद, शीला दीक्षित, मोहसिना किदवई को राहुल-सोनिया के चारों तरफ़ सुरक्षात्मक घेरा बनाए देखा गया.
वहीं क़ानूनी दिग्गज जैसे कपिल सिब्बल, अश्विनी कुमार और अभिषेक मनु सिंघवी भी इस महिमा का आनंद ले रहे थे.
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कांग्रेस के भीतर चल रही कनबतियों की मानें तो इन क़ानूनी दिग्गजों को बाहर का रास्ता दिखाया जाना था.
निजी तौर पर इन वकीलों को पार्टी और यूपीए सरकार की प्रतिष्ठा कमतर करने के लिए ज़िम्मेदार माना गया था. जैसे 2जी घोटाले और सीएजी से उलझने में सिब्बल की भूमिका, अश्विनी कुमार का केंद्रीय क़ानून मंत्री पद से इस्तीफ़ा और सिंघवी की ‘अश्लील सीडी’ सामने आना.
इसके अलावा अखिल भारतीय कांग्रेस कमेटी के चार महासचिवों बीके हरि प्रसाद, मुकुल वासनिक, जर्नादन द्विवेदी और दिग्विजय सिंह को भी पार्टी नेताओं के तौर पर मामूली प्रदर्शन करने के आधार पर हटाने की बात चल रही थी.
यह भी कहा जा रहा था कि सोनिया ख़ुद को ‘सलाहकार की भूमिका’ तक सीमित करने वाली हैं और राहुल पार्टी की कमान पूरी तरह से हाथों में ले लेंगे.
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ऐसे में नेशनल हेरल्ड मामला कांग्रेस के भीतर सत्ता समीकरणों को बदलने के लिए कैसे और क्यों ज़िम्मेदार साबित हुआ?
पार्टी के कुछ नेताओं के मुताबिक़ ओल्ड गार्ड्स सोनिया को यह समझाने में कामयाब रहे कि पार्टी को यंग इंडियन बनाने और सोनिया-राहुल को इसका साझीदार बनाने का ख्याल अच्छा नहीं था.
आख़िरकार, 1938 से 2008 तक कभी भी नेहरू-गांधी परिवार का कोई व्यक्ति सीधे नेशनल हेरल्ड के प्रकाशन वाले एजेएल समूह में ट्रस्टी नहीं रहा था. फ़िरोज़ गांधी को भी लखनऊ में नेशनल हेरल्ड का हिस्सा होने के बावजूद एजेएल से तनख़्वाह मिलती थी.
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माना जा रहा है कि 2011 में जब सोनिया गांधी की तबियत ख़राब हुई थी और अनिश्चितता का माहौल उभरा था, तब टीम राहुल के कुछ सदस्यों ने यंग इंडियन कंपनी बनाने का विचार रखा, जिसके ज़रिए एजेएल की संपत्ति को इकट्ठा करके सोनिया-राहुल को अहम हिस्सेदार बनाया गया. इस पर वोरा, ऑस्कर और अहमद पटेल जैसे वरिष्ठ नेताओं ने भी सहमति दी थी.
इसके बाद चले आरोप-प्रत्यारोप के खेल में पुराने वफ़ादर ओल्ड गार्ड्स ने ख़ुद को रक्षक के तौर पर पेश किया.
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प्रियंका गांधी को लाया गया और उन्होंने टीम राहुल और दूसरों में बिना किसी भेदभाव के पार्टी की पूरी क्षमता का इस्तेमाल भीड़ जुटाने, क़ानूनी लड़ाई और मीडिया प्रबंधन जैसे कामों में किया.
नतीजा शानदार रहा क्योंकि मई, 2014 के बाद पहली बार पार्टी आक्रामक, एकजुट और बुलंद नज़र आई.
इसने पार्टी के अंदर एक तबक़े को निराश किया जो ‘राहुल कांग्रेस’ की मज़बूती की उम्मीद में था. जो सोचता था कि राहुल दो तरह के नेताओं को आगे लाएंगे– एक, जो चुनाव जीतने में सक्षम हैं और दूसरे, तकनीकी-पेशेवर पृष्ठभूमि वाले क्षमतावान.
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यह तबक़ा जयपुर अधिवेशन (जनवरी, 2014) में राहुल गांधी के संबोधन पर भरोसा कर रहा था, जब राहुल ने वायदा किया था कि हर किसी को जबावदेह बनाया जाएगा.
अगर राहुल अपने भाषण के मुताबिक़ क़दम उठाते तो उन बहुत से आधारहीन नेताओं का बड़ा नुक़सान होता, जो सिर्फ़ वफ़ादारी और चमचागिरी के चलते पद पाते रहे हैं.
राहुल गांधी का सफ़ाई अभियान एक तरह से उन्हें विरासत में मिले राजीव गांधी के अधूरे एजेंडे को पूरा करने जैसा लग रहा था. कांग्रेस के शताब्दी वर्ष 1985 में 41 साल के ‘मिस्टर क्लीन’ वाले राजीव गांधी ने मुंबई के ब्रेबॉर्न स्टेडियम में पार्टी में मौजूद सत्ता दलालों को निशाना बनाया था.
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उन्होंने कहा था, ''सत्ता और रसूख के दलाल कांग्रेस जैसी जनांदोलन से निकली पार्टी को सामंती कुलीनतंत्र में बदलने के लिए संरक्षण दे रहे हैं. ऐसे लोग जाति-धर्म आधारित नारे देकर कांग्रेस के जीवित संगठन को जकड़ने की कोशिश में हैं.''
राजीव ने अर्जुन सिंह को उपाध्यक्ष बनाकर उन्हें कांग्रेस के भीतर सफ़ाई का काम सौंपा लेकिन जो वह चाहते थे, वैसा बदलाव नहीं हुआ.
कांग्रेस को ‘आधुनिक’ बनाने की योजना को तब कार्यकारी अध्यक्ष कमलापति त्रिपाठी ने चुनौती दी. इस वरिष्ठ नेता ने जो पत्र लिखा, उसके कुछ अंश मीडिया में लीक हुए थे. इसमें उन्होंने राजीव से पूछा था कि क्यों उन ‘पेशेवरों’ को पार्टी में जगह दी जा रही है जो ‘किसी काम के नही’ हैं.
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राजीव गांधी ने ‘सत्ता के दलाल’ वाले बयान में किसी का नाम नहीं लिया था. मगर त्रिपाठी ने बताया था कि 1978 में कांग्रेस के तमाम बड़े नेताओं ने इंदिरा को अकेला छोड़ दिया था, तब भी उनकी वफ़ादारी में कोई कमी नहीं आई थी.
मौजूदा कांग्रेस में उन नेताओं की कमी नहीं, जो राहुल के नेतृत्व में हर चुनाव जीतने की तमन्ना रखते हैं, पर वो भी चाहते हैं कि राहुल पार्टी की सफ़ाई में नाकाम रहें.
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वो उन्हें ‘सबके जज’ के बतौर नहीं चाहते, जिसका उन्होंने जयपुर में वायदा किया था. उनकी इच्छा है कि राहुल पहचान की राजनीति, जाति-समुदाय और धर्म के आधार पर ‘प्रतिभाओं’ को आगे बढ़ाते रहें.
राहुल के सामने सबसे बड़ी चुनौती है कि क्या वे पार्टी में ‘सब चलता है’ का रवैया चलने देंगे या उसे बदलाव की दिशा में ले जाएंगे? साल 2016 की पहली छमाही में इसका जवाब मिलना चाहिए.

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