Monday, 7 December 2015

इस साल कार्बन उत्सर्जन 'रुका, घट भी सकता है'

कार्बन उत्सर्जनImage copyrightspl
नए आंकड़ों के अनुसार दुनिया में कार्बन उत्सर्जन के थोड़ा घटने की उम्मीद है. शोधकर्ताओं का कहना है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के लगातार विकसित होने के बावजूद पहली बार ऐसा हुआ है.
इस आकलन में शामिल वैज्ञानिकों का मानना है कि चीन में कोयले के घटते इस्तेमाल और नवीकरणीय ऊर्जा के बढ़ते इस्तेमाल से ऐसा संभव हुआ है.
लेकिन उनका कहना है कि ये कमी अस्थाई है और उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ कार्बन उत्सर्जन बढ़ेगा ही.
पेरिसImage copyrightAP
पेरिस में कांफ्रेंस ऑफ़ पार्टीज़ के सामने प्रस्तुत 'नेचर क्लाइमेट चेंज' नाम की पत्रिका में छपे इस अध्ययन के मुताबिक़, 2015 में जीवाश्म ईंधन और उद्योगों से उत्सर्जित कार्बन में 0.6 फ़ीसदी की कमी दर्ज की गई. 2014 में ये उत्सर्जन इतना ही बढ़ा था.
वर्ष 2000 से कार्बन उत्सर्जन हर साल 2-3 फ़ीसदी बढ़ा है. हालांकि वैश्विक अर्थव्यवस्था 2014 और 2015 में 3 फ़ीसदी की दर से विकसित हुई है.
इस अध्ययन की प्रमुख ईस्ट एंग्लिया विश्वविद्यालय की प्रोफ़ेसर कोरिन लि केर ने माना कि चीन में कोयले का घटता इस्तेमाल और नवीकरणीय ऊर्जा का बढ़ता प्रयोग कार्बन उत्सर्जन में इस कमी का कारण हैं.
लेकिन चीन अब भी सबसे ज़्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाला देश है. पूरी दुनिया के 27 फ़ीसदी कार्बन का फैलाव यहीं होता है.
बहरहाल प्रो. केर ने बीबीसी को बताया कि चूंकि दुनिया की ज़्यादातर उभरती हुई अर्थव्यवस्थाएं कोयले के प्रयोग पर निर्भर करती हैं इसलिए कार्बन उत्सर्जन के दोबारा शुरू होने की संभावना है.
बान की मूनImage copyrightgetty
Image captionकांफ्रेंस ऑफ पार्टीज़ की मंत्रिस्तरीय बैठक में यूएन महासचिव बान की मून
ब्रिटेन जैसी औद्योगिक अर्थव्यवस्था में ये उत्सर्जन कम तो हो रहा है लेकिन बहुत कम मात्रा में.
2014 में भारत सबसे ज़्यादा कार्बन उत्सर्जन करने वाले देशों में चौथे स्थान पर था लेकिन अब भारत में उत्सर्जन की तेज़ी से बढ़ती दर शोधकर्ताओं के लिए चिंता का विषय है.
अध्ययन में शामिल प्रोफ़ेसर डाबो गुआन ने कहा कि अगर ऊर्जा की संरचना में बिना किसी महत्वपूर्ण सुधार के भारत की अर्थव्यवस्था बढ़ती रहती है तो कार्बन उत्सर्जन काफ़ी बढ़ जाएगा.
प्रोफ़ेसर लि केर ने बीबीसी को बताया, "मौसम में आ रहे बदलाव से निपटने के लिए हमें इस उत्सर्जन को शून्य पर लाना होगा. और हम बात कर रहे हैं शून्य विकास की, शून्य उत्सर्जन की नहीं- यानी हम उससे अभी कोसों दूर हैं."
"अगर पेरिस में कोई मज़बूत और स्पष्ट समझौता होता है तो ये उत्सर्जन कम करने की दिशा में अहम शुरुआत होगी."

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