Tuesday, 22 December 2015

वो कैसे रोकेंगी पति को प्रधान पति बनने से..

पंचायत चुनाव, उत्तर प्रेदशImage copyrightPTI
देशभर के स्थानीय निकायों के चुनावों में महिलाएं बड़ी तादाद में चुनी जा रही हैं जो अच्छा संकेत है.
यह इस बात का सूचक भी है कि कैसे भारतीय जनतंत्र कई सामाजिक समूहों को अपने में शामिल कर रहा है.
पर इस बढ़ती भागीदारी की साथ कई तरह की शंकाएं, समस्याएं और संभावनाएं भी दिखती हैं.
मिसाल के लिए उत्तर प्रदेश पंचायत चुनावों में महिलाएं बड़ी संख्या में प्रधान पद के लिए चुनी गईं.
Image copyrightReuters
अभी तक इसमें पुरुषों का दबदबा रहा. इस चुनाव में 44.79 प्रतिशत महिलाओं ने प्रधानी चुनाव में पर्चा भरा था, जिसमें से 43.86 प्रतिशत विजयी हुईं.
इसमें 33 प्रतिशत महिला सुरक्षित क्षेत्र के अतिरिक्त महिलाओं ने 10 प्रतिशत पुरुष या कहे सामान्य क्षेत्र में भी औरतें जीती हैं.
इससे ज़ाहिर होता है कि पंचायती राज्य के ज़रिए भारतीय समाज में जनतंत्र नीचे तक बढ़ रहा है.
यही नहीं, यूपी के मुस्लिम बहुसंख्यक ज़िलों में भी मुस्लिम महिलाओं ने पंचायत चुनाव में जीत हासिल की है.
ऐसे ज़िलों में संभल में 54.5 प्रतिशत, रामपुर में 54.4 प्रतिशत, मुरादाबाद 51 प्रतिशत और बदायूं में 50.5 प्रतिशत महिलाएं जीती हैं.
इससे नतीजा निकलता है कि जनतांत्रिक चेतना धीरे-धीरे मुस्लिम समाज के भीतर फैलते हुए महिलाओं के राजनीतिक सशक्तीकरण का दरवाज़ा खोल रही है.
Image copyrightPTI
लेकिन यूपी के ग्राम प्रधानी चुनाव में महिलाओं की बढ़ी भागीदारी को सेलिब्रेट करते हुए यह भी देखना होगा कि ये महिलाएं कौन हैं? किस वर्ग से हैं? इनके भीतर नारी चेतना कितनी है? ये अपने पति, भाई, पिता के प्रभाव से कितनी आज़ाद हैं और लोकतंत्र को कितनी ताक़त दे सकती हैं?
इनमें से कुछ तो पढ़ी-लिखी हैं, पर ज़्यादातर थोड़ी पढ़ी-लिखी, अर्द्धशिक्षित या अशिक्षित हैं.
हालांकि पढ़ाई का क्षमता और राजनीतिक विवेक से संबंध नहीं पर सरकारी नीतियां, नीतियों की भाषा समझने के लिए लिखना-पढ़ना आना ज़रूरी है.
ऐसे में कम पढ़ी लिखी औरतें राज चलाने की ताक़त खो सकती हैं और कामकाज की जद्दोजहद में शोषण का शिकार भी हो सकती हैं.
भारतीय समाज विशेषकर उत्तर भारतीय समाज में परिवार की बुनावट ऐसी है, जिसमें महिलाओं की निर्णय क्षमता पर अभी पुरुष प्रभावी हैं.
Image copyrightabha sharma
देखना यह है कि ये महिलाएं कैसे अपने पतियों को प्रधान पति बनने से रोक पाती हैं. परिवार के पिता, भाई, पति से संबंध रखते हुए भी खुद निर्णय लेकर विकास नीचे तक पहुँचा पाती हैं.
उत्तर प्रदेश के इस पंचायत चुनाव में एक समस्या दिख रही है. वस्तुतः इन विजयी महिलाओं में ज़्यादातर पूर्व प्रधान की पत्नी, विधायक की भाभी, मंत्रियों की पत्नी, जिला पंचायत सदस्य की चाची, अधिकारियों की बुआ हैं.
ऐसी महिलाएं शक्तिशाली प्रभावशाली लोगों का रबर स्टांप बनकर उनके द्वारा पंचायती राज्य के लिए आ रहे धन की बंदरबाट में या तो चुप हो शामिल रहेंगी या फिर उनके कहे कागज़ों पर दस्तख़त करती रहेंगी.
मध्य प्रदेश और राजस्थान के स्थानीय निकायों में भी बड़े घरों की महिलाओं के कारण फैलता हुआ दिखता लोकतंत्र दरअसल सिकुड़ा है.
Image copyrightAFP
इस ताक़तवर समुदाय की महिलाएं आख़िरकार परिवार के मर्दों की ताक़त और रसूख का ज़रिया बनकर रह गई हैं.
उम्मीद की जाए कि उत्तर प्रदेश में ऐसा न हो और जनतंत्र की यह प्रक्रिया सही मायने में जनतांत्रिक हो पाए.
उत्तर प्रदेश में जीती महिलाओं में से कुछ पीएचडी और एमबीए हैं तो कई स्वाभाविक नेतृत्व की क्षमता से भरी हैं.
देखना यह है कि कैसे वे खुद को विकसित करते हुए, दृढ़ बनाते हुए विकास और जनतंत्र को समाज के आख़िरी आदमी तक पहुँचा पाती हैं.
राज्य की नौकरशाही, भ्रष्टाचार से जूझते तंत्र, कानूनी दांवपेंच वगैरह से भी उन्हें उलझते हुए अपनी क्षमता साबित करनी होगी.
इन शंकाओं और समस्याओं के बाबजूद यह आधी आबादी, अगर आधे जनतांत्रिक मूल्यों की रक्षा भी कर पाती है तो भारतीय जनतंत्र का भविष्य संभावनाओं से भरा होगा.

No comments:

Post a Comment