महबूब-ए-इलाही, यानी वो इंसान जिससे अल्लाह मोहब्बत करता है. औलिया हज़रत निज़ामुद्दीन के आशिक़ उन्हें इसी नाम से पुकारते हैं.
हज़रत निज़ामुद्दीन की दरगाह का रास्ता दिल्ली की सदियों पुरानी बस्ती की भीड़ और गंदगी भरी गलियों से गुज़रता है. इस साल उनका 802वां जन्मदिन मनाया जा रहा है.
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का जन्म बदायूं में हुआ था, जहाँ उनके माता-पिता मध्य एशिया के बुखारा- आज के उज़बेकिस्तान के एक शहर से आ कर बसे थे.
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया जब पांच वर्ष के थे, तभी उनके पिता का देहांत हो गया था. 16 साल की उम्र में उनकी माँ उन्हें लेकर दिल्ली आ गई थीं जहाँ उन्होंने शिक्षा ली.
अमीर खुसरो उनसे इसी समय मिले थे. बाद में बाबा फ़रीद गंज-ए-शकर के कहने पर उन्होंने अपनी खानकाह दिल्ली के बाहर- उस समय की सीरी– गाँव घियासपुर (आज की निज़ामुद्दीन बस्ती) में बनाई.
दिल्ली में रहने के बावजूद हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया राजनीति से दूर रहे और कभी बादशाहों को अपने से नहीं जुड़ने दिया.
कहा जाता है कि एक बार अल्लाउद्दीन खिलजी उनसे लगातार मिलने की कोशिश कर रहे थे जिससे वो तंग आ चुके थे. परेशान होकर उन्होंने कहा था, "मेरे घर में दो दरवाज़े हैं अगर सुल्तान एक से अन्दर आएगा तो मैं दूसरे से बाहर निकल जाऊंगा."
उनके चाहने वालों की भीड़ खानकाह में हमेशा रहती थी, जिसमें आम इंसान के अलावा योगी, साधु और कलंदर भी शामिल थे. अमीर खुसरो ने लिखा है, "आपने बाबा फ़रीद के नाम को आगे बढ़ाया है, आप निज़ाम हैं और मैं निज़ामी".
उनको ‘निज़ाम’ के नाम से पहली बार अमीर खुसरो ने पुकारा था. खुसरो, हज़रत के सबसे प्रिय शिष्य थे.
हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के देहांत के समय खुसरो दिल्ली में नहीं थे. कहते हैं कि औलिया को उनकी बेहिसाब मोहब्बत का पता था और उन्होंने कहा था कि मेरी मृत्यु के बाद खुसरो को मेरे पास नहीं आने देना वरना वो जिंदा नहीं रह सकेगा.
ख़ुसरो के दर्द का अंदाज़ा उनकी लिखी ग़ज़ल ‘गोरी सेवे सेज पर मुख पर डारे केस. चल ख़ुसरो घर आपने रैन भई चहुँ देस’ से लगाया जा सकता है.
आज ख़ुसरो की ही लिखी कव्वाली से यहाँ का आँगन गूंजता है और हज़रत निजामुद्दीन औलिया की दरगाह में दुआ करने से पहले मुरीद उनकी मज़ार पर माथा टेकता है और फिर बड़े दरबार का रुख करता है.
हज़रत निजामुद्दीन औलिया के जन्म की तारीख इस्लामी कैलंडर के दूसरे महीने ‘सफ़र’ का आख़िरी बुधवार है, जो मंगलवार को होगी. पूरी रात उनका जन्मदिन ‘सालाना गुसल’ के रूप में मनाया जाएगा.
‘सालाना गुसल’ में न सिर्फ हिंदुस्तान बल्कि पाकिस्तान, अफग़ानिस्तान, यूरोप और अमरीका आदि देशों से उनके चाहने वाले पहुँचते हैं.
बाहर आँगन में बैठ, एक के बाद एक क़व्वाल जन्मदिन पर नज़राना पेश करते हैं और भीतर पर्दे के पीछे ‘नहलाना’ (गुसल) चल रहा होता है.
औलिया की मज़ार को केवड़ा, चन्दन और इत्र से स्नान कराने वालों में उनके वंशजों में से कोई चार लोग होते हैं.
केवड़े और इत्र की खुशबू के बीच ‘मेरी मैली गुदरिया धो दे, गंज-ए-शकर के लाल, बाबा फ़रीद के लाल’ गाते निज़ामी-कव्वालों की रूहानी आवाज़ ग़ज़ब माहौल बनाती है.
इस बीच रात में गुसल हो जाने के बाद मज़ार के दरवाज़ों को बंद कर दिया जाता है, जिसे दोबारा सुबह होते ही खोला जाता है और गुलाब की चादर पेश की जाती है.
‘इस्लामी कैलंडर’ में तारीख़ें अंग्रेज़ी कैलंडर में क़रीब 15 दिन पहले होती जाती हैं इसलिए धीरे-धीरे गुसल की रात यानी हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया का जन्मदिन सर्दियों से ग़र्मियों की तरफ बढ़ रहा है.
ऐसे वक़्त में, जब हिंदुस्तान में संसद से सड़क तक 'असहिष्णुता' पर चल रही बहस कर्कशता के नए आयाम छू रही हो, दिल्ली के इस कोने में एक मज़ार पर होने वाली क़व्वालियाँ आपको थोड़ा सुकून दे सकती हैं.
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