Monday, 14 December 2015

‘अपराध के लिए उम्र नहीं और सज़ा के लिए उम्र’

इन तीन सालों में हमें कहां-कहां संघर्ष नहीं करना पड़ा, किस-किस के दर नहीं भटकना पड़ा. मेरी अपनी ज़िंदगी कुछ नहीं बची है. बस यही मक़सद है कि किसी तरह उनको सज़ा हो जाए और बच्ची को इंसाफ़ मिल जाए.
फ़ाइल फोटोImage copyrightAFP
तीन साल गुज़र गए हैं कि लेकिन लगता है कि हम वहीं के वहीं खड़े हैं.
कहते हैं कि समय बीतता है तो याद धुंधली हो जाती है लेकिन हमारे साथ ऐसा नहीं हुआ.
हमें लगता है कि आज भी हम वही सफ़दरजंग (अस्पताल) और घर के बीच में हैं. सारी चीज़ें साफ़ वैसे ही दिखती हैं.
उस समय बहुत लोगों का आना-जाना रहा. समय नहीं था कि कुछ सोचें, लेकिन अब कभी-कभी बिल्कुल अकेले होते हैं तो बहुत मुश्किल होती है.
फ़ाइल फोटोImage copyrightGetty
बाहर रहते हैं, लोगों से बात होती है लेकिन घर में मुझसे आज भी अकेले नहीं रहा जाता. मुझे नींद नहीं आती.
जैसे-जैसे ये दिन आ रहा है, लग रहा है कि नहीं, अभी तो ये (मेरी बेटी) आई थी, मेरे साथ थी. तो और यादें ताज़ा होती जाती हैं. हमें लगता है कि कभी हम इससे उबर पाएंगे या नहीं.
हम अपने आप में लड़ते रहे हैं कि हमारी कहां ग़लती थी, बच्ची की कहां ग़लती थी, क्यों हो गया ऐसे, जो हो गया, उससे हमारे समाज, हमारी व्यवस्था ने क्या सबक़ लिया.
ऐसा नहीं है कि लोगों ने सबक़ लिया है. रोज़ घटनाएं होती हैं. रोज़ बच्चियों को कहीं कुएं में, कहीं जंगल में, कहीं जलाकर मार दिया जाता है.
'निर्भया' के माता-पिताImage copyrightsumit dayal
तकलीफ़ ये होती है कि हम कैसे समाज में रह रहे हैं, कैसे प्रशासन में रह रहे हैं कि जनता को किसी की कोई परवाह ही नहीं है.
अगर एक मुजरिम को बचाना होता है तो पूरी कायनात लग जाती है कि उनको फांसी नहीं होनी चाहिए, उनको सज़ा नहीं होनी चाहिए. और अगर एक बच्ची रोड पर पड़ी रहती है, बचाने के लिए चिल्लाती है तो कोई सुनता ही नहीं है. देखकर मुंह मोड़ लेता है.
तकलीफ़ होती है कि हम कहां जी रहे हैं. इतना कुछ होने के बावजूद भी 100 साल पुराने क़ानून में हमारी सरकार, हमारी न्यायपालिका जी रही है कि क़ानून के अंदर हमें सज़ा देना है, क़ानून में यही है. और मुजरिम अपराध करते वक़्त न उम्र देखता है, न समय देखता है.
अपराध के लिए कोई उम्र नहीं और सज़ा के लिए उम्र देखते हैं. तो मुझे अब निराशा हो रही है अपनी क़ानून व्यवस्था से.
फ़ाइल फोटोImage copyrightAFP GETTY IMAGES
आज हमारे समाज में चल रहा है कि बेटियों को बचाइए, पढ़ाइए, उन्हें शिक्षा दीजिए. हमने तो ये 25 साल पहले कर दिया.
हमने तो उसे बेटों जैसा ही माना, बल्कि उससे भी ज़्यादा माना.
हमारे मन में ये रहता था कि कहीं इसके मन में न आए कि हमारे मां-बाप हमें भाई से कम प्यार करते हैं.
भाई भी उस पर जान छिड़कते थे. पहले उसको कोई चीज़ पकड़ाते थे फिर कुछ लेते थे. तो हमने क्या किया कि क़ुदरत ने भी हमारा साथ नहीं दिया.
फ़ाइल फोटोImage copyrightAFP
कोई ऐसा भी वक़्त नहीं था कि बच्ची 12 बजे घूम रही है, दो बजे घूम रही है. साढ़े आठ, नौ बजे कोई वक़्त नहीं होता है. उस वक़्त आदमी दफ़्तर से आता है. हम आज भी अपने आप से जूझते हैं कि हमने ऐसा क्या कर दिया कि हमारे साथ ऐसा हुआ.
मुझे ऐसा नहीं लगता कि अगर मैंने (कुछ और) किया होता तो घटना न हुई होती.
वो पेपर देकर आई थी और इंटर्नशिप के लिए भागदौड़ कर रही थी. अस्पतालों में उसके इंटरव्यू हो रहे थे तो हम कहां तक उसके साथ रहते.
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यही मैं ढूंढती हूं कि कहां हमसे चूक हो गई.
वो घर बताकर भी गई थी कि मम्मी मैं इतने देर में आ रही हैं. तो मैं यही सोचती हूँ कि कहां उसकी ग़लती थी कि उसके साथ ऐसे हो गया.

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