Wednesday, 2 December 2015

जहाज ठीक नहीं कर पाया तो खेती करूंगा'

तरुमित्र, स्कूली बच्चेImage copyrightSeetu Tiwari
अमीशा पटना के 'ओपन माइंड बिरला स्कूल' में नौवीं की छात्रा हैं. प्लेट भर कर खाना लेना और मन न होने पर छोड़ देना उनकी आदत थी. लेकिन कुछ दिन पहले खाना छोड़ देने की ये आदत छूट गई और ये बदलाव चंद घंटों में आया.
अमीशा ने धान के खेत में अपने दोस्तों के साथ कटनी और पीटनी की. नतीजा ये हुआ कि किसान और अन्न के प्रति उनका नज़रिया बदल गया.
अमीशाImage copyrightSeetu Tiwari
वह कहती हैं, "खेत में काम करने के बाद अब मैं थोड़ा सा भी खाना फेंक नहीं सकती. इतनी मेहनत है इस काम में और मैं इतनी आसानी से खाना फेंक देती थी. अब तो घर में भी कोई खाना फेंकता है तो मैं उसे टोक देती हूं."
दरअसल अमीशा और उस जैसे कई बच्चों में ये बदलाव पटना के दीघा स्थित तरूमित्र आश्रम के चलते आया. 10 एकड़ में फैले इस आश्रम के दो एकड़ हिस्से में जैविक खेती होती है. बीते चार साल से इस खेती के काम में स्कूली बच्चों का सहयोग लिया जाता है.
tarumitra_kids_farmingImage copyrightSeetu Tiwari
धान की रोपनी से लेकर उसकी पीटनी तक में बच्चों को लगाया जाता है. 2014 में 600 बच्चों को इसका हिस्सा बनाया गया था.
साल 1988 में पटना के कुछ छात्रों ने मिलकर तरुमित्र नाम का संगठन बनाया था. संगठन पर्यावरण संरक्षण के लिए काम करता है.
तरूमित्र के निदेशक राबर्ट एथिकल बताते हैं, "हम पहले ये काम मज़दूरों से करवाते थे लेकिन बाद में ये तय हुआ कि बच्चों को इस प्रक्रिया का हिस्सा बनाया जाए."
तरुमित्र, रॉबर्ट एथिकलImage copyrightSeetu Tiwari
"इसके अच्छे नतीजे भी आए. बच्चों की पर्यावरण के प्रति मानसिकता बदली और बच्चे जब आश्रम से जाते हैं तो साग सब्जी के कई पौधे अपने घर के लिए ले जाते हैं."
नौवीं के ही छात्र रोहन आनंद से बात करके पता चलता है कि बदलाव का दौर सिर्फ अन्न बचाने की मुहिम तक नहीं थमा.
tarumitra_kids_farmingImage copyrightSeetu Tiwari
रोहन, विकास के नाम पर खेती की ज़मीन के अतिक्रमण के संकट पर आगाह करते हैं.
वह कहते हैं, "मैं खेती-बाड़ी की छोटी-छोटी बातें सीखने की कोशिश तो करूंगा ही लेकिन लोगों से भी कहूंगा कि आपको जो विकास करना है वह बंज़र जमीन पर करें, खेती की ज़मीन पर नहीं."
धान की कटनी में बड़ी एहतियात से हिस्सा ले रही यशस्वनी मूल रूप से समस्तीपुर की हैं.
tarumitra_kids_farmingImage copyrightSeetu Tiwari
वह बताती हैं, "अपने गांव में कभी खेत पर नहीं जाते. हमेशा लगता था कि खेती का काम छोटे लोग करते हैं. लेकिन आज समझ आया कि खेती में दिमाग और शरीर दोनों की ज़रूरत है."
"यहां जब हमने पीटनी की तो हमेशा ये ध्यान में रखने को कहा गया कि धान का एक दाना भी हमसे दूर जाकर न गिरे."
tarumitra_kids_farmingImage copyrightSeetu Tiwari
वहीं मयंक कहते हैं, "यहां आकर इतना तो पता चला कि खेती अगर वैज्ञानिक तरीके से की जाए तो आने वाले दिन में ये फ़ायदे का काम बनने वाला है. मैं एयरोनाटिकल इंजीनियर बनना चाहता हूं. हवाई जहाज ठीक नहीं कर पाया तो खेती करूंगा."
बच्चों को खेती की प्रक्रिया का हिस्सा बनाए जाने को स्विट्जरलैंड की पर्यावरण विशेषज्ञ फ्लोरा सुखद मानती है. फ्लोरा बिहार में सोलर पम्प को लेकर काम कर रही है.
tarumitra_kids_farmingImage copyrightSeetu Tiwari
फ्लोरा कहती हैं, "हमारे यहां स्विट्जरलैंड में लोग अपने साप्ताहिक अवकाश को खेती करके या कुदरत के नज़दीक रहकर बिताते हैं. लेकिन भारत के विविधता भरे समाज में यह नहीं दिखता. यहां लोग खेती से कटते जा रहे हैं जो एक खतरे का स्पष्ट संकेत है. हालांकि तरुमित्र जैसी छोटी-छोटी कोशिशें उम्मीद भी बंधाती हैं."

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