बीजेपी ने असम में अपना चुनाव अभियान शुरू तो कर दिया है, लेकिन उसकी राह आसान नहीं है. असम के चुनावी समीकरण और पार्टी के चुनावी इतिहास को देखते हुए ये बहुत मुश्किल लग रहा है कि वह सरकार बनाने में कामयाब होगी.
चुनाव अगले साल अप्रैल में होने हैं.
बिहार में करारी हार के बाद अब असम के चुनाव बीजेपी के लिए बेहद अहम हो गए हैं. मोदी-शाह की जोड़ी और पार्टी दोनों की प्रतिष्ठा वापस पाने के लिए ज़रूरी है कि वह असम में जीते.
वैसे भी अगले साल जिन राज्यों में चुनाव होने हैं उनमें से केवल असम ही है, जहाँ वह कोई उम्मीद लगा सकती है.
बीजेपी ने विजय के लिए मिशन 84 यानी दो तिहाई बहुमत का अति महत्वाकांक्षी लक्ष्य बना रखा है. असम की 126 सदस्यीय विधानसभा में उसके अभी केवल पांच सदस्य हैं. अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि जीत के लिए उसे कितनी लंबी छलाँग लगानी होगी.
नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष और चुनाव अभियान के प्रभारी सर्वानंद सोनोवाल से एक तरह से चमत्कार की आशा की जा रही है. ये सही है कि केंद्रीय मंत्री बनने के बाद उनका आकर्षण बढ़ा है, मगर अब उन्हें असम के बजाय दिल्ली के प्रतिनिधि के तौर पर ज़्यादा देखा जा रहा है. ये पार्टी के लिए नुक़सानदेह हो सकता है.
बीजेपी आलाकमान को ये एहसास ज़रूर होगा कि असम की राजनीतिक परिस्थितियाँ बिहार से अलग भी हैं और जटिल भी.
असम का सामाजिक ढाँचा इतना विविधतापूर्ण है कि उससे तालमेल बैठाना टेढ़ी खीर साबित होगा.
मुसलमानों की अधिक आबादी (34.2 फ़ीसद) वाले इस राज्य में जनजातियों की भी अच्छी संख्या (15-20 फ़ीसद) है, जो उसका खेल बिगाड़ने के लिए काफ़ी है.
पार्टी नेतृत्व ने ज़ाहिर कर दिया है कि वह विकास के बजाय हिंदुत्व के कार्ड पर ज़्यादा भरोसा करेगा.
इसीलिए अपने चुनावी अभियान की शुरूआत में ही उसने चुनाव को मुस्लिम बनाम अन्य का मुक़ाबला बनाना शुरू कर दिया है. प्रदेश के राज्यपाल ने भी इसमें अपना योगदान दे दिया है.
बीजेपी पिछले चुनावों में भी यही करती रही है. लेकिन बांग्लादेशियों के मुद्दे के बहाने सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करके चुनावी लाभ उठाने की उसकी कोशिशें कभी सफल नहीं हुईँ.
अब सवाल उठाया जा रहा है कि क्या इस बार ये दाँव चलेगा और चलेगा तो क्यों?
बीजेपी की उम्मीदों का आधार लोकसभा चुनाव में मिली शानदार सफलता है. कुल चौदह में से सात सीटें जीतने वाली बीजेपी 66 विधानसभा क्षेत्रों में आगे रही थी. उसके सामने इस प्रदर्शन को न केवल दोहराने बल्कि बेहतर करने की चुनौती है.
लेकिन बीजेपी ने बिहार में देख लिया है कि लोकसभा की सफलता का मतलब विधानसभा चुनाव में जीत नहीं होता. लोकसभा चुनाव में उसे काँग्रेस विरोधी लहर और नरेंद्र मोदी के आकर्षण का भरपूर फ़ायदा मिला था. आज वैसी स्थिति नहीं है.
केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दोनों के कामकाज को लेकर आम जनता में निराशा बढ़ी है.
बीजेपी की उम्मीद इस बात पर भी टिकी है कि पंद्रह साल के शासन की वजह से तरूण गोगोई सरकार के ख़िलाफ़ जो सत्ता विरोधी माहौल बना है उसका फ़ायदा उसे मिलेगा. ऐसी उम्मीद उसने पिछले चुनाव में भी लगाई थी, मगर हुआ उल्टा. काँग्रेस और भी ताक़तवर बनकर उभरी.
बीजेपी के आशावाद की तीसरी वजह काँग्रेस से आए हेमंत बिश्व सर्मा हैं. वे अपने साथ नौ विधायक लेकर आए थे. पहले लगा था कि उन्होंने काँग्रेस को बहुत नुक़सान पहुँचाया है, मगर अब ये दिखाई दे रहा है कि उनके जाने के बाद से काँग्रेस ज़्यादा एकजुट और संगठित हुई है.
भाजपा को यह नहीं भूलना चाहिए कि काँग्रेस के अलावा असम गण परिषद और बदरूद्दीन अजमल की एआईयूडीएफ़ भी मैदान में हैं. पिछली विधानसभा में इन दोनों ही पार्टियों की ताक़त (क्रमश: 10 और 18 सीटें) उससे ज़्यादा थी. काँग्रेस का सहयोगी दल बोडोलैंड पीपल्स फ्रंट (12 सीटें) बोड़ो इलाक़ों में एक तरह से अपराजेय माना जाता है.
अगर कोई महागठबंधन बनता है या इन तीन दलों के साथ काँग्रेस किसी तरह का तालमेल कर लेती है तो बीजेपी की उम्मीदों पर पानी फिरना तय है. कुछ इलाक़ों में वामपंथी दल भी प्रभाव रखते हैं और वे भी बीजेपी को नुक़सान ही पहुँचाएंगे.
असम के चुनाव का विश्लेषण करते समय दो चीज़ों पर ग़ौर करना बहुत ज़रूरी है. अव्वल तो वहाँ के जनजातीय समुदायों का क्या रुख़ होगा और दूसरे अल्पसंख्यक किस ओर जाएंगे.
जनजातियों का झुकाव पारंपरिक रूप से काँग्रेस की ओर रहा है, मगर अब वैसी बात नज़र नहीं आ रही. वे अब दूसरे विकल्पों की ओर भी देखने लगे हैं. ऊपरी असम में सोनोवाल की वजह से मुमकिन है कि बीजेपी उन्हें एक हद तक आकर्षित कर ले. लेकिन जीत के लिए ये काफ़ी होगा या नहीं ये देखने वाली बात होगी.
जहाँ तक अल्पसंख्यंकों का ताल्लुक़ है तो वे एआईडीयूएफ़ और काँग्रेस के बीच में बँटे हुए हैं. बांग्लादेश से लगी सीमा वाली सीटों में मुस्लिम आबादी अच्छी-ख़ासी है, ख़ास तौर पर निचले असम के इलाक़ों में. उसे सबसे अधिक सफलता भी यहीं मिली थी.
अगर मुसलमान मतदाता काँग्रेस का दामन छोड़ दें या उनके वोट बँट गए तो एआईडीयूएफ़ का तो भला होगा ही, बीजेपी को भी इसका फ़ायदा मिल सकता है. ऐसी स्थिति में काँग्रेस को भारी नुक़सान हो सकता है. लेकिन अगर मुस्लिम मतदाताओं ने बिहार के पैटर्न पर वोट किया तो बीजेपी के सपनों पर पानी फिर जाएगा.
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