अलगाववादी उल्फ़ा नेता अनूप चेतिया को बुधवार तड़के भारत के हवाले करने की ख़बर के बाद केंद्र सरकार के साथ शांति वार्ता में शामिल उल्फ़ा का अरविंद राजखोवा गुट इसे बड़ी उपलब्धि बता रहा है.
वहीं केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरेन रिजिजू ने चेतिया ने कहा कि ये प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की सक्रिय भूमिका का फल है.
तर्क दिए जा रहें है कि अगर चेतिया भारत सरकार के साथ शांति वार्ता में अरविंद राजखोवा गुट के साथ शामिल होते है तो इससे वार्ता विरोधी अलगाववादी नेता परेश बरूवा को बड़ा झटका लगेगा.
तिनसुकिया ज़िले के एक छोटे से गांव जेराई में पले बढ़े अनूप चेतिया उर्फ गुलाब बरूवा उल्फ़ा के स्वंभू मुख्य सेनाध्यक्ष परेश बरूवा के चचेरे भाई हैं.
असम पुलिस की मोस्ट वांटेड सूची में शामिल चेतिया को 1979 में उल्फ़ा की स्थापना के समय संगठन का महासचिव बनाया गया था.
उल्फ़ा में उपमुख्य सेनाध्यक्ष रहें और अब शांति वार्ता गुट के नेता राजू बरूवा ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि चेतिया संगठन में राजनीतिक मामले देखते थे, लेकिन वे शस्त्र चलाने और गुरिल्ला युद्ध में भी काफ़ी माहिर थे.
चेतिया से 1994 मे अपनी अंतिम मुलाक़ात का ज़िक्र करते हुए बरूवा ने कहा कि संगठन में उनकी काफ़ी अहमियत रही है. परेश बरूवा भी उनकी बात को कभी अनदेखी नहीं करते थे.
केंद्र सरकार के साथ 2011 में शांति वार्ता में शामिल होने के बाद संगठन के कई नेता अपने सुत्रों के जरिए चेतिया के साथ संपर्क में रहे और उनसे सुझाव लेने के लिए कुछ लोगों को बांग्लादेश भी भेजा गया.
बरूवा कहते है कि सरकार के साथ शांति वार्ता में चेतिया की ज़रूरत थी. उन्होनें संगठन को शुरू से चलाया और अब सभी उल्फ़ा नेता चाहते है कि वे औपचारिक रूप से वार्ता गुट में शामिल हो. तकरीबन 18 साल बांग्लादेश की जेल में रहे उल्फ़ा महासचिव चेतिया के ख़िलाफ़ असम के कई थानों में हत्या, अपहरण और उगाही के मामले दर्ज हैं.
राजनीतिक मायने
असम में 2016 के विधानसभा चुनाव से पहले चेतिया का भारत प्रत्यर्पण और उल्फ़ा के साथ शांति वार्ता समझौता खासकर भाजपा के लिए भी काफ़ी अहम बताया जा रहा है.
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री रिजिजू ने मंगलवार को कहा कि उल्फ़ा के वार्ता समर्थक गुट के साथ जल्द ही शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए जाएगें.
केंद्रीय मंत्री ने यहां तक कहा कि असम की छह जनजातियों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की उल्फ़ा की मांग लगभग स्वीकार कर ली गई है और फाइल कैबिनेट की अंतिम मंज़ूरी के लिए प्रधानमंत्री के पास है.
वरिष्ठ पत्रकार सुबीर भौमिक कहते है कि उल्फ़ा के साथ केंद्र सरकार की शांति वार्ता दरअसल असम के लोगों की भावना से जुड़ा एक मुद्दा है. महज कुछ महीनों में असम विधानसभा चुनाव होनें है, इसलिए उल्फ़ा शांति वार्ता को लेकर मोदी सरकार पर सबकी नज़र रहेगी.
लेकिन यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अनूप चेतिया किस तरफ़ जाते है. उल्फा इस समय दो भागों में बंट चुका है. एक तरफ़ उल्फ़ा के परेश बरूवा अपने कैडरों के साथ म्यांमार के जंगलों से सशस्त्र जंग छेड़े हुए है और दूसरी तरफ़ केंद्र सरकार वार्ता समर्थक उल्फ़ा गुट के साथ बात कर रही है.
अगर भारत सरकार चेतिया को वार्ता में शामिल कर लें तो इससे परेश बरूवा को बड़ा झटका लगेगा. अपने चचेरे भाई चेतिया का समर्थन नहीं मिलने से परेश बरूवा विचलित हो उठेगें. भौमिक कहते है कि चेतिया अगर शांति वार्ता गुट में शामिल होते है तो यह असम में स्थाई शांति के लिए काफ़ी महत्वपूर्ण फैसला होगा.
भौमिक का यह भी कहना है कि बिहार चुनाव में बड़ा झटका खा चुकी भाजपा को अगले साल जिन राज्यों में चुनाव लड़ने है, उनमें असम में पार्टी की हालत थोड़ी ठीक है, लिहाजा मोदी सरकार उल्फ़ा वार्ता में जरूर गंभीरता दिखाएगी.
सांगठनिक रूप से कमजोर पड़ चुके परेश बरूवा ने नगा अलगावादी संगठन एनएससीएन (खापलांग) के साथ पूर्वोत्तर राज्यों के कुछ चरमपंथी संगठनों को लेकर एक संयुक्त मोर्चा बनाया है, जो इस समय खासकर सुरक्षा बलों पर हमलें करने के इरादे से सक्रिय है. लेकिन लगता है भारत सरकार ने अब ऐसे सगंठनों से निपटने के लिए पूरी तरह से ठान ली है. सरकार के सुरक्षा रणनीतिकार कई तरीकों से इन अलगाववादियों पर दवाब बना रहें है.
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