Wednesday, 27 January 2016

कोई बताए, इन आंखों की ख़ता क्या थी?

Image copyrightSmita Sharma
दिल्ली में 16 दिसंबर, 2012 के निर्भया कांड के बाद पूरे भारत में काफ़ी आक्रोश दिखा. सरकार पर भी सख़्त क़ानून का दबाव बढ़ा पर फिर भी देश में बलात्कार के मामले कम नहीं हो रहे हैं.
भारत की फोटो पत्रकार स्मिता शर्मा पिछले कई साल से बलात्कार पीड़िताओं के दुख-दर्द को अपने कैमरे में क़ैद कर रही हैं.
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उनकी कोशिश बलात्कार पीड़िताओं की पहचान उजागर करना नहीं है, लिहाजा इन तस्वीरों में आपको पीड़िताओं का चेहरा नज़र नहीं आएगा.
लेकिन आप उनकी आंखें देखकर अंदाज़ा लगा सकते हैं कि उनके भी सपने होंगे और उसे पूरा करने की उम्मीदें भी होंगी.
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लेकिन एक अपराध से उनका पूरा जीवन पटरी से उतर जाता है. मुश्किल है कि तमाम जागरूकता के बावजूद और कड़े क़ानून के बाद भी देशभर में बलात्कार के मामले कम नहीं हो रहे हैं.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक़ 2012 में भारत में बलात्कार के 24,923 मामले दर्ज हुए थे.
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2013 बलात्कार के मामले बढ़कर 33,707 हो गए और 2014 में बलात्कार के मामलों की संख्या 35,000 से ज़्यादा हो गई.
ये बलात्कार के वैसे मामले हैं, जो पुलिस रिकॉर्ड में दर्ज हुए हैं. ऐसे मामलों की संख्या भी हज़ारों में होगी जहां वो चारदीवारियों में ही दबकर रह जाते हैं.
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इन बलात्कार पीड़िताओं के दोषियों को क़ानून भले सज़ा दे दे, पर असली चुनौती तो इनके जीवन को फिर से पटरी पर लाने की है.
स्मिता शर्मा देश भर में घूम-घूमकर स्थानीय स्वास्थ्यकर्मियों और ग़ैरसरकारी संगठनों की मदद से बलात्कार पीड़िताओं की कहानी दर्ज कर रही हैं.
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उनकी तस्वीरों से ज़ाहिर होने वाला सबसे दुखद पहलू यह है कि बहुत कम उम्र की लड़कियों के साथ भी बलात्कार के मामले आपको नाउम्मीद कर देते हैं.
फ़ोटोग्राफ़ी के साथ-साथ स्मिता शर्मा यौन हिंसा के प्रति लोगों को जागरूक बनाने और उन्हें शिक्षित करने वाले समूह और बलात्कार पीड़ितों की मदद से साइकिल खरीदने वाले अभियान के लिए फ़ंड जुटाने के अभियान से भी जुड़ी हैं.

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