काबुल का चिकन स्ट्रीट ऐसी चीज़ों के लिए मशहूर है जहां से लोग अफ़ग़ानिस्तान की यादों को चीज़ों की शक्ल में ख़रीदकर अपने साथ ले जाते हैं.
विदेशी सेना और कामगारों के चले जाने से यहां के व्यापार को काफ़ी नुक़सान पहुंचा है.
लैपीस लैज़ुली (क़ीमती पत्थर) की एक दुकान में जहां कभी दस कामगारों की जगह होती थी वहीं अब उसकी जगह चार कामगारों को रखा जाता है.
यह क़ीमती पत्थर अफ़ग़ानिस्तान के उत्तरी प्रांत बादाख़शान के खानों में पाया जाता है.
इसके व्यापारी का कहना है कि पिछले साल से इसकी क़ीमत में ज़बरदस्त गिरावट आई है. इसकी क़ीमत क़रीब 43 हज़ार रुपए प्रति किलो से घटकर क़रीब 10 हज़ार रुपए प्रति किलो हो गई है.
तालिबान के पतन के एक साल बाद 2002 में चिकन स्ट्रीट में काफ़ी रौनक़ आई थी. व्यापारियों का कहना है कि यह साल सबसे बेहतरीन था क्योंकि इस साल बड़े पैमाने पर विदेशी सेना और कामगार आए थे.
इस स्ट्रीट का नाम चिकन स्ट्रीट एक मुर्ग़े की दुकान की वजह से पड़ा जो कि किंग ज़ाहिर शाह के समय में था.
नाटो की सेना चिकन स्ट्रीट की सुरक्षा में तबसे तैनात रहती है जब अक्तूबर 2004 में एक क़ालीन की दुकान पर सेना के जवानों को निशाना बनाते हुए आत्मघाती हमला किया गया था.
इस हमले में एक अफ़ग़ानी महिला और एक लड़की मारी गई थी.
अकबर सामांदरी सालों से चिकन स्ट्रीट में आभूषण और पुरानी चीज़ों की दुकान चलाते हैं. उनका कहना है, "जब विदेशी आए थे तो वो वक़्त चिकन स्ट्रीट के लिए सबसे बढ़िया वक़्त था. लेकिन यह सिर्फ़ 2007 तक रहा जब तक कि सुरक्षा व्यवस्था ख़राब नहीं हो गई. विस्फोट और आत्मघाती हमले शुरू हो गए."
अफ़ग़ानिस्तान में मशहूर क़ालीन और ग़लीचों का बाज़ार भी ख़स्ताहाल में है. दूसरे व्यापारों के साथ क़ालीन का व्यापार भी चिकन स्ट्रीट में ख़राब हालत में है.
हाल के सालों में चिकन स्ट्रीट के रेस्टॉरेंट और स्पोर्ट्स क्लब बंद हुए हैं. इसने जूस और बर्गर की फुटपाथी दुकानों के लिए जगह बना दी है.
एक ओर जहां चिकन स्ट्रीट की दुकानों पर अफ़ग़ानी चीज़ों की मांग कम हो रही हैं वहीं आभूषणों की दुकान पर चाइनीज़ सामान दिखने लगे हैं
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