असम के मुख्यमंत्री तरुण गोगोई एक और चुनावी लड़ाई में उतरने की तैयारी कर चुके हैं. लेकिन सबसे बड़ा सवाल है कि क्या वे लगातार चौथी बार चुनाव जीतने का करिश्मा दिखा पाएंगे?
क्या उनका राजनीतिक कौशल और अनुभव काँग्रेस की डगमगाती नैया को पार लगा पाएगा?
इस बार मुक़ाबला कहीं ज़्यादा कठिन है. बीजेपी ज़्यादा तैयारी के साथ मैदान में है. 11 जनजातियों ने अपना अलग राजनीतिक दल बना लिया है. क्षेत्रीय राजनीति की रक्षा के लिए भी एक संगठन आकार ले चुका है.
काफ़ी कुछ इस पर निर्भर करेगा कि अगले दो-तीन महीनों में कैसे चुनावी समीकरण बनते हैं और कौन से मुद्दे हावी होते हैं. लेकिन इसमें कोई दो मत नहीं है कि नेतृत्व के मोर्चे पर तरुण गोगोई सबसे आगे हैं.
लगातार तीन विधानसभा चुनावों में मिली जीत से उनका क़द बढ़ता चला गया है. पिछले दो चुनाव में सत्ता विरोधी लहर को धता बताते हुए वे पार्टी को जीत दिलाने में कामयाब रहे.
सन् 2011 के चुनाव में तो उनके नेतृत्व में पार्टी ने अप्रत्याशित रूप से 78 सीटें जीती थीं.
हालाँकि लोकसभा चुनाव में चौदह में से केवल तीन सीटें जीतने की वजह से सवाल ज़रूर उठे, लेकिन इस हार की मुख्य वजह काँग्रेस विरोधी लहर और मोदी के आकर्षण को माना गया, न कि राज्य सरकार की नाकामी को.
ये साफ़ दिख रहा है कि प्रदेश में 81 साल के गोगोई के जोड़ का कोई नेता फ़िलहाल मैदान में नहीं है.
असम गण परिषद के नेता प्रफुल्ल कुमार महंत अपनी चमक बहुत पहले ही खो चुके हैं, जबकि बीजेपी के नए प्रदेश अध्यक्ष सर्वानंद सोनोवाल अभी छवि निर्माण की प्रक्रिया से गुज़र रहे हैं.
गोगोई ऊपरी असम के हैं और आहोम जनजाति के हैं, मगर उनको किसी एक वर्ग, धर्म या क्षेत्र से जोड़कर नहीं देखा जाता. ब्रह्मपुत्र घाटी में तो वे लोकप्रिय हैं ही, बराक घाटी में भी उनकी पहचान ठीक-ठाक है.
वहीं महंत ब्रह्मपुत्र घाटी तक सीमित हैं तो सोनोवाल केवल ऊपरी असम तक.
गोगोई क़रीब छह दशक से राजनीति में हैं. वे छात्र जीवन में ही राजनीति और समाज सेवा से जुड़ गए थे. उन्होंने 1960 के भाषा आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और फिर सक्रिय राजनीति में भी आ गए.
गोगोई ने दिल्ली और दिसपुर दोनों की सियासत को बड़ी कुशलता से सँभाला है. पंद्रह साल से मुख्यमंत्री की कुर्सी पर क़ाबिज़ रहना उनके इस हुनर को साबित करता है.
हेमंत बिश्वसर्मा के रूप में उन्हें केवल एक बड़ी चुनौती मिली, जिसे हाई कमान के आशीर्वाद से उन्होंने निपटा दिया.
नरसिंह राव सरकार में मंत्री और काँग्रेस के राष्ट्रीय सचिव रहे गोगोई की छवि एक परिपक्व नेता की है. असमिया मीडिया में उनके अंदाज़ और बयानों का माखौल ज़रूर उड़ाया जाता है, लेकिन उन्हें दब्बू नहीं माना जाता.
हालाँकि कई बार उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे, लेकिन कुछ प्रमाणित नहीं हो पाया. इसीलिए मोटे तौर पर उन्हें बेदाग़ माना जाता है.
हाँ, ये ज़रूर है कि पार्टी के अंतर्कलह और लंबे समय तक सत्ता में रहने की वजह से उनकी लोकप्रियता गिरी है.
अपने बेटे को आगे बढ़ाने की कोशिशों ने भी उनकी निजी छवि और पार्टी दोनों को नुक़सान पहुँचाया. उनके दाहिने हाथ समझे जाने वाले हेमंत बिश्वसर्मा के अलग होकर बीजेपी में शामिल होने के पीछे भी ये एक बड़ी वजह बताई जाती है.
उनका बेटा उसी सीट (कलियाबोर) से सांसद है जिससे पहले वे चुने जाते थे.
गोगोई का अपने इलाक़े यानी ऊपरी असम की राजनीति में तो अच्छा दख़ल है ही, जनजातियों की राजनीति पर भी उनकी ठीक-ठाक पकड़ है.
इसीलिए जनजातियों के बीच चल रहे इतने सारे संघर्षों के बावजूद वे अपनी नैया खेते रहे.
उनके कार्यकाल में हुई हिंसा की कई बड़ी वारदातों और जनजातियों के असंतोष ने उनकी नेतृत्व क्षमता को लेकर प्रश्न खड़े किए.
ख़ास तौर पर बोडो इलाक़े में हुए कई नरसंहार उनके नेतृत्व पर एक बड़ा धब्बा हैं.
लेकिन ये भी एक हक़ीक़त है कि असम जैसे अशांत और जटिल परिस्थितियों वाले राज्य को उन्होंने सँभाले रखा. उनके शासनकाल में उग्रवादी हिंसा के आँकड़े घटे हैं.
लगातार सख़्ती की वजह से उल्फ़ा अलगाववादियों को घुटने टेकने पड़े. उसका बड़ा हिस्सा अब वार्ता की मेज़ पर है.
सरकारी आँकड़ों के मुताबिक़, क़रीब दस हज़ार उग्रवादियों ने समर्पण किया है. अपहरण, फ़िरौती और हत्याओं का सिलसिला काफ़ी हद तक क़ाबू में आ चुका है.
यही वजह है कि शांति क़ायम करने को काँग्रेस अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है.
एक धर्मनिरपेक्ष नेता के तौर पर गोगोई की छवि साफ़-सुथरी है. अल्पसंख्यक उन पर भरोसा करते हैं तो हिंदुओं और जनजातियों का उदार वर्ग भी मानता है कि वे सांप्रदायिक राजनीति नहीं करते.
वैसे कहा तो ये भी जाता है कि पिछले चुनाव में उन्होंने हिंदुओं को रिझाकर ही बड़ी जीत हासिल की थी.
लेकिन ये भी सच्चाई है कि ख़ुद को मुसलमानों के अकेले नुमांइदे के रूप में पेश करने वाले बदरूद्दीन अजमल और उनकी पार्टी ऑल इंडिया यूनाईटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एयूडीएफ़) का वे खुलकर विरोध करते रहे हैं.
एयूडीएफ़ ने कांग्रेस को बहुत नुक़सान भी पहुँचाया है. पिछले लोकसभा चुनाव में तीन सीटें वह उसी के चलते हारी थी.
गोगोई असम का विकास करने का भी दावा करते हैं, लेकिन आम लोग इस मामले में उनसे निराश भी हैं और नाराज़ भी.
पंद्रह साल के लंबे कार्यकाल में उनकी उपलब्धियाँ ऐसी नहीं हैं जिन्हें वे गर्व के साथ चुनाव में पेश कर सकें. शासन और प्रशासन में भ्रष्टाचार की शिकायतें भी बढ़ी हैं.
उन्हें ज़्यादा से ज़्यादा इस बात का श्रेय दिया जा सकता है कि उन्होंने असम के हालात को और बिगड़ने नहीं दिया और पहले के मुक़ाबले शांति की संभावना को मज़बूत किया.
बहरहाल, असम चुनाव में एक बार फिर गोगोई के नेतृत्व की परीक्षा होगी. अगर वे इसमें कामयाब रहे तो एक जीत के लिए तरस रही कांग्रेस को थोड़ी ऑक्सीजन मिल जाएगी. इससे उनका क़द भी पहले से कई गुना बढ़ जाएगा.
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