Monday, 28 December 2015

घोटाले तो पुराने हैं, पर आंच अब क्यों?

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अरुण जेटली के सामने जो चुनौती है, वो लुटियंस दिल्ली के लिए भी चुनौती है.
अपने रिपोर्टिंग करियर के शुरुआती साल मैंने दिल्ली से बाहर बिताए. अरुण जेटली से मेरी पहली मुलाक़ात 2003 में भोपाल में हुई थी. वे दिग्विजय सिंह के ख़िलाफ़ भारतीय जनता पार्टी के विधानसभा चुनाव अभियान के प्रभारी बनकर आए थे.
उस वक़्त जेटली रोज़ाना दोपहर में प्रेस कांफ्रेंस करते थे और दिग्विजय सिंह के प्रशासन के दावों की हवा निकालते थे और शाम को वापस दिल्ली में मध्य प्रदेश के चुनिंदा पत्रकारों के साथ दरबार लगाते. इनमें ऐसे पत्रकार भी होते जो उनके साथ दिल्ली लौटकर अपनी रिपोर्टें फ़ाइल करते थे.
शुरू में, मैंने महसूस किया कि इस तरह के संवाद का कोई मतलब नहीं है. ऐसी बातचीत में सूचनाएं कम होती थी, गप-शप ज़्यादा. यह एक तरह से नज़दीकी बढ़ाने की कोशिश थी और इसका फायदा अरुण जेटली को ही होता था. इस गपशप की वजह से मीडिया में कई ऐसी ख़बरें आईं जिनमें जेटली का नज़रिया झलकता था.
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बहरहाल, जेटली का पत्रकारों का नेटवर्क असरदार है. पत्रकारों से ही नहीं, बल्कि मीडिया घरानों के मालिकों से भी उनकी ऐसी निकटता है, जिसका भारतीय राजनीति में दूसरा उदाहरण नज़र नहीं आता.
उनका प्रभावशाली दायरा उद्योगपतियों, शीर्ष वकीलों, बैंकरों, टेलीविजन एंकरों, संपादकों और दिल्ली के सोशलाइट तबके को मिलाकर और बड़ा हो जाता है.
यह ऐसा सर्किल बनाता है, जो बाक़ी देश से भले कटा हुआ हो लेकिन चाहे सरकार जिस भी पार्टी की बने, सत्ता तक इस सर्किल की पहुंच हमेशा होती है, यानी इस सर्किल के लोगों के लिए बड़े से बड़ा काम भी एक या दो फ़ोन कॉल में होता रहा है.
यह प्रभावशाली तबका मानता है कि जेटली अपनी ही पार्टी में मिसफ़िट हैं, वे संघ के कट्टर लोगों के बीच उदारवादी हैं.
वैसे मध्यप्रदेश और गुजरात में चुनाव अभियान के दौरान मुझे जेटली के अंदर हिंदुत्व को लेकर कट्टर सोच के काफ़ी सबूत मिले लेकिन जेटली के आसपास जो प्रभावशाली तबका है, उसमें वर्ग, शैली और पहुंच से बनी झूठी निकटता के सामने उनकी कट्टरता कहीं छिप जाती है.
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यह प्रभावशाली तबका ही जटेली को मीडिया की आलोचनाओं से बचाता रहा है. हाल तक, बिशन सिंह बेदी और कीर्ति आज़ाद जैसे लोगों की आवाज़ों को अनसुना किया जाता रहा, जबकि ये लोग सालों से जेटली की अध्यक्षता के दौरान दिल्ली क्रिकेट एंड डिस्ट्रिक्ट एसोसिएशन (डीडीसीए) के अंदर वित्तीय अनियमितताओं की बात उठाते रहे हैं.
दिल्ली के लुटियंस ज़ोन में जिस तरह से चीज़ें होती हैं, उनके चलते ज़्यादातर मीडिया संस्थानों में ऐसी कोई बात लिखना संभव नहीं था, जिसका अप्रत्यक्ष असर भी जेटली पर पड़े.
बीते एक महीने में इस स्थिति में बदलाव आया. इसकी वजह अरविंद केजरीवाल हैं, जिन्होंने जेटली पर आरोप लगाए हैं. वे लुटियंस ज़ोन के नियमों से नहीं चलते.
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यह भी एक वजह है कि उन्हें लोगों ने दिल्ली में सत्ता सौंपी है, क्योंकि जतना रसूखदार लोगों से तंग है. पूरे देश में भी यही वजह रही है कि कांग्रेस नेतृत्व में सुविधाभोगी प्रवृति के बोबाले को देखने के बाद लोगों ने मोदी को जीत दिलाई. वे लोग अब दिल्ली में कामकाज के तौर तरीकों में बदलाव देखना चाहते हैं.
मोदी मतदाताओं की अपेक्षाओं पर खरे उतरने में नाकाम साबित हुए. ऐसे में, केजरीवाल नाकाम होने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं.
केंद्र सरकार के नुमाइंदे के तौर पर काम करे उपराज्यपाल से लगातार केजरीवाल का टकराव होता रहा है. लेकिन जब सीबीआई ने उनके प्रमुख सचिव राजेंदर कुमार के ख़िलाफ जांच के सिलसिले में दिल्ली में कई जगह छापे मारे तो केजरीवाल अप्रत्याशित रूप से भड़क गए.
अब तक जो भी बात सामने आई है, उन्हें देखते हुए सीबीआई की जांच के लिए पर्याप्त वजहें हैं लेकिन यह सिद्धांतों की लड़ाई नहीं है, बल्कि यह लड़ाई सत्ता और सुविधा की है.
जब केजरीवाल मोदी को मनोरोगी कहते हैं, तो उनसे ऐसी भाषा की किसी को उम्मीद नहीं होती है लेकिन इससे आपको वो भी याद आता है कि गुजरात में मोदी कैसे गांधी परिवार के ख़िलाफ़ सख़्त भाषा इस्तेमाल करते थे.
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इसके अलावा, जिस तरह से 2002 के सांप्रदायिक दंगे के आरोपों के जवाब में मोदी ने प्रतिक्रिया दी थी, ठीक उसी तरह केजरीवाल ने रक्षात्मक होने के बजाए आक्रामक रवैया अपनाया है.
उन्होंने मोदी प्रशासन की सबसे कमज़ोर कड़ी अरुण जेटली पर हमला बोला.
अब तक जिस मज़बूती ने जेटली को मीडिया की आलोचना से बचाया, वही आज उन्हें कमज़ोर कर रही है. उनकी अपनी पार्टी में भी लोग इस बात का इंतज़ार कर रहे हैं कि कब उनके प्रति मोदी का लगाव कम हो.
इनमें लाल कृष्ण आडवाणी से लेकर संघ और राम जेठमलानी से लेकर सुब्रमण्यम स्वामी तक जैसे लोग शामिल हैं. जेटली के लिए दुश्मनों की कोई कमी नहीं है और ये सब के सब केजरीवाल के हमले को एक मौके के रूप में देख रहे हैं.
यही वजह है कि पिछले कुछ सप्ताह की तुलना में जेटली अब कहीं ज़्यादा परेशान दिख रहे हैं. हालांकि प्रभावशाली तबका उनको बचाने की हरसंभव कोशिशों में जुटा है, क्योंकि जेटली की गैर मौजूदगी में मोदी इस रसूख़दार लोगों के ख़िलाफ कदम उठाने को मजबूर होंगे.
ये लड़ाइयां उससे कहीं ज़्यादा सीधी और आक्रामक होती जा रही है, जो अब तक दिल्ली की लुटियंस ज़ोन में हुई हैं.
वैसे ये लड़ाई अब मोदी के चुनावी अभियान के सबसे अहम वादे और उनकी प्रशासन की वास्तविकता की भी लड़ाई बन चुकी है.
जो भी हो, दिल्ली में रसूख़वालों वाला ये तबका इतनी आसानी से ग़ायब नहीं होगा, लेकिन जेटली पर हमले से यह तबका ख़ुद को पहले से कम सुरक्षित महसूस करेगा.

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