Tuesday, 8 December 2015

एक दिन में 1500 युवा छोड़ रहे हैं नेपाल

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नेपाल में अप्रैल में आए भूकंप में नौ हज़ार लोगों की मौत हुई थी और लाखों बेघर हो गए थे.
इस विनाश के बाद लोगों के पास बहुत ही कठिन विकल्प है, या तो नेपाल में रुक कर वो देश को दोबारा खड़ा करने में मदद करें या विदेश जाकर अधिक पैसा कमाएं.
एक दिन में आमतौर पर 1500 लोग हर रोज़ यहां से विदेश के लिए रवाना होते हैं.
25 वर्षीय साबिन के मन में यही दुविधा है. हम उसके गांव में एक चाय की दुकान के बाहर बैठे हैं और हमारे पैरों के आसपास कुछ मुर्ग़ियां ठहल रही हैं.
इसी बीच साबिन कहते हैं, "मुझे अब तक क़तर वापस चले जाना चाहिए था जहां मेरी नौकरी है. वहां मुझे फ़ुटबॉल विश्व कप के लिए स्टेडियम बनाने की नौकरी मिली है."
लेकिन उनके मन में चिंता भी है. वो कहते हैं, "अगर मैं चला जाता हूं तो मेरा परिवार इस ठंड के मौसम में कैसे गुज़ारा करेगा? लेकिन अगर रुकता हूं तो नया घर बनाने के लिए पैसा कहां से आएगा."
साबिन का घर भूकंप में नष्ट हो गया था. उनकी पत्नी और दो बच्चे अब भी एक अस्थायी नालीनुमा लोहे के घर में रह रहे हैं.
साबिन के गांव पहुंचने के लिए काठमांडू से बस में तीन घंटे लगते हैं. पहली नज़र में उनके गांव को देखकर गांव वाला अहसास आता है, सुकून सा मिलता है.
पास से गुज़रती हुई एक भैंस, उड़ती हुई चिड़िया. एक उम्रदराज़ व्यक्ति जिसने अपने कंधे पर बच्चे को बैठा रखा है और चावल के खेतों से गुज़र रहा है.
दूर चलती हुई हवा हिमलाय पर मौजूद बर्फ़ को हटा रही है और नीले आसमान में सफ़ेद बादल किसी कूची से की हुई पेंटिंग जैसे लगते हैं.
वहीं दूसरी तरफ़ दो साल में पहली बार क़तर से वापस आए साबिन के अनुसार यह केवल पैसे की बात नहीं है.
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साबिन कहते हैं, "कितने सारे मर्द नेपाल छोड़कर चले गए हैं. अब यहां पर कोई भी नहीं बचा है जो घरों को दोबारा बनाए."
उनके अनुसार, "कोई भी नहीं है जो पाइप सही करे, बिजली का काम करे, सभी चले गए हैं."
विदेशों में नौकरी करने के लिए पिछले 20 वर्षों में क़रीब 35 लाख लोग नेपाल छोड़कर जा चुके हैं. ये यहां की आबादी का कुल 10 प्रतिशत हिस्सा है.
इसमें से अधिकतर साबिन जितने ही जवान हैं. साबिन एक सवाल पूछते हैं, "क्या आप वो देख पा रहे हैं जो यहां नहीं है?"
जवाब में वो ख़ुद ही कहते हैं, "कोई भी जवान मर्द यहां नहीं है. वो सभी क़तर, आबू धाबी, दुबई और हर जगह हैं केवल यहीं नहीं हैं."
लेकिन नेपालियों के लिए अपना ठंडा देश छोड़कर खाड़ी देशों में जाकर नौकरी करना आसान नहीं है जहां का तापमान 40 डिग्री से भी ऊपर चला जाता है.
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साबिन कहते हैं, "कई लोगों को खाड़ी देशों में जाने के बाद यह अहसास होता है कि वो वहां की भौगोलिक परिस्थितियों में नहीं रह सकते."
वो आगे कहते हैं, "कुछ लोग अत्याधिक गर्मी की वजह से मर जाते हैं. लेकिन कुछ ऐसे भी हैं जिनकी मौत ठंड की वजह से होती है."
उनके अनुसार, "कई घंटे गर्मी में काम करने के बाद कुछ मज़दूर थोड़ी देर आराम करने के लिए एयर कंडिशनर वाली जगहों पर जाते हैं और वहां उन्हें ऐसी नींद आती है कि वो फिर कभी आंख नहीं खोलते. हम उन्हें मौत का कमरा बुलाते हैं."
विदेशों में काम कर रहे नेपाली जो रक़म अपने देश भेजते हैं वो यहां की अर्थव्यवस्था का एक अहम स्रोत है. यहां अधिकतर लोग दो डॉलर (क़रीब 133 रुपए) प्रतिदिन से भी कम की राशि पर गुज़ारा कर रहे हैं.
यहां 10 साल तक चला गृह युद्ध 2006 में ख़त्म हुआ लेकिन उसके बाद भी यहां राजनीतिक अस्थिरता जारी है.
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दक्षिणी नेपाल के मधेसी लोगों का दावा है कि नए संविधान में उनके साथ भेदभाव किया गया है.
इसके विरोध में उन्होंने भारत-नेपाल सीमा की उस जगह नाकाबंदी कर रखी है जहां से ईंधन, दवाइयां और अन्य ज़रूरी चीज़ें भारत से आयात होती है.
कई ऐसे भी हैं जो भारत पर इस बात का आरोप लगा रहे हैं कि वो नेपाल पर अपना वर्चस्व दिखाने की कोशिश करने के साथ राजनीतिक अशांति भी फैला रहा है.
दूसरी तरफ़ हम साबिन के घर के बचे हुए हिस्से पर चढ़ते हैं. वहां केवल दो दरवाज़े ही बचे हैं जो एक लकड़ी से बनी एक खपच्ची के सहारे खड़े हैं.
साबिन कहते हैं, "यहां के लोग बहुत ही चिंता में हैं. जब भी बच्चे कोई तेज़ आवाज़ सुनते हैं तो वो अपने आश्रयों से बाहर भाग आते हैं. मेरी मां उन्हें कहती है कि ज़मीन के भीतर अभी भी देवताओं और शैतानों के बीच लड़ाई चल रही है."
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साबिन जिस आश्रय में फ़िलहाल रह रहे हैं वहां बहुत ही अंधेरा है और हर तरफ़ सीलन है. दीवार पर एक बड़ा फ़्लैट सक्रीन टीवी है जो वो अपने परिवार के लिए क़तर से गिफ़्ट के तौर पर लाए थे.
लेकिन उसमें बिजली का कोई कनेक्शन नहीं है. कुछ दिनों बाद मैं काठमांडू के छोटे से एयरपोर्ट से वापस जा रहा हूं.
वहां 'प्रवासी कामगार' नाम की लाइन में कई जवान लड़के खड़े हैं जो विदेश जा रहे हैं.
उन्होंने अच्छे कपड़े पहन रखे हैं और ऐसा लगा रहा है कि जैसे कोई युवा छुट्टियों पर जा रहा हो मज़दूरी करने नहीं. मैं इनमें से साबिन को भी खोज रहा हूं, लेकिन उसने आख़िरकार रुकने का मन बनाया है.
लेकिन शायद वो वापस जाएगा उसी धूप में पसीना बहाने और फ़ुटबॉल स्टेडियम बनाने के लिए. और साथ ही ये सपना देखेगा कि शायद एक दिन वो वापस आएगा और अपने गांव की ठंडी हवा में अपने घर को दोबारा खड़ा करेगा.

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