फ्रांस की राजधानी पेरिस में इन दिनों दुनिया के तमाम देशों के नेता जलवायु परिवर्तन से निपटने की रणनीति बनाने के लिए इकट्ठा हुए हैं.
भारत की ओर से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कई अन्य विशेषज्ञ संयुक्त राष्ट्र के इस अहम सम्मेलन में शिरकत कर रहे हैं.
मोदी ने इससे पहले 'मन की बात' में ग्लोबल वार्मिंग के कारण देश में पड़ रहे बेमौस सूखे और बारिश और बाढ़ की बात की थी.
मोदी ने जलवायु परिवर्तन के कारणों को जानने के लिए विश्व के इतिहास, ख़ास कर औद्योगिक क्रांति की तरफ़ झांकने के लिए कहा.
हालांकि भारत ने जलवायु परिवर्तन पर अपनी स्थितियां साफ़ कर दी है, मोदी ने सोमवार को पेरिस में कहा, "जिन पश्चिमी देशों ने गत वर्षों में जीवाश्म ईंधन के बल पर तरक्की की है, उन्हें भी जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए बड़े कदम उठाने होंगे."
उन्होंने कांफ्रेंस में भारतीय पैवेलियन का उद्घाटन करते हुए कहा कि ''जलवायु परिवर्तन हमारे कारण नहीं हुआ है. इसका कारण ग्लोबल वार्मिंग है जो कि औद्योगिक क्रांति के दौरान जीवाश्म ईंधन के कारण हुआ.''
बहरहाल, भारत के समक्ष तेज़ी से होता जलवायु परिवर्तन एक बड़ा मुद्दा है जिसकी वजह से मौसम में परिवर्तन साफ़ तौर से देखा जा सकता है. विश्व बैंकके अनुसार साल 1990 में भारत में कार्बन उत्सर्जन 0.8 मैट्रिक टन प्रति व्यक्ति था. यह आंकड़ा 2011 तक लगभग दो गुना बढ़ कर 1.7 मैट्रिक टन प्रति व्यक्ति तक पहुंच चुका है.
इस बात को ध्यान में रखने की आवश्यकता है कि अनुमानों के मुताबिक़ कुछ दशकों में भारत दुनिया में सबसे ज़्यादा आबादी वाला देश बन सकता है.
इतनी बड़ी आबादी की बिजली, पानी, छत, खाद्य आपूर्ति को देखते हुए मौसम परिवर्तन और उसके पीछे के कारणों से नज़र फेरना घातक हो सकता है.
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