पाकिस्तान ने विकलांग क़ैदी अब्दुल बासित की फांसी पर दो महीने के लिए रोक लगा दी है. राष्ट्रपति ममनून हुसैन ने बासित की शारीरिक स्थिति की जांच के आदेश दिए हैं.
राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से जारी एक बयान में कहा गया है कि मानवाधिकारों की हर क़ीमत पर रक्षा की जाएगी.
मौत की सज़ा का मानवाधिकार संगठन विरोध कर रहे हैं.
राष्ट्रपति के आदेश के बाद अब्दुल बासित की फांसी चौथी बार रुकी है. इससे पहले सितंबर में उनकी फांसी सज़ा रोक दी गई थी.
मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के मुताबिक़ अब्दुल बासित को फांसी मानवीय गरिमा और पाकिस्तानी क़ानून के ख़िलाफ़ होगी, जिसमें व्हीलचेयर इस्तेमाल करने वाले किसी व्यक्ति को फांसी देने के बारे में नियम स्पष्ट नहीं हैं.
हत्या के मामले में मौत की सज़ा पाए बासित जेल में ही लकवाग्रस्त हो गए थे. उनकी कमर से नीचे का हिस्सा बेकार हो गया. इस वजह वो अब चल फिर भी नहीं सकते.
सितंबर में अब्दुल बासित ने जेल की कोठरी में अपनी पत्नी और मां से आख़िरी विदा ले ली थी. और जेल अफ़सरों को अपनी आख़िरी इच्छा भी बता दी थी.
फांसी के दिन 22 सितंबर को सवेरा होने से पहले उन्हें काला पायजामा और कमीज़ पहनाई गई थी और व्हीलचेयर से उन्हें फांसी के फंदे तक ले जाया जा रहा था.
तभी जेल के एक गार्ड ने आकर बताया कि जेल अधिकारी चाहते हैं कि पहले बारिश रुक जाए.
तेज़ बारिश धीमी पड़ी और फिर रुक गई लेकिन फिर दोबारा होने लगी. कई बार ऐसा हुआ, पर उन्हें इस बीच कोई आदेश नहीं मिला.
आख़िर पता चला कि अब्दुल बासित की फांसी टाल दी गई है.
मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल के मुताबिक़ पाकिस्तान फांसी की सज़ा देने वाला बदतरीन मुल्क बन गया है.
उधर, प्रधानमंत्री को लिखे पत्र में पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग ने कहा था कि ऐसा कोई तरीक़ा नहीं है जिसके तहत पाकिस्तान या फिर अंतरराष्ट्रीय क़ानून में किसी अपाहिज़ को फांसी के फंदे पर लटकाया जा सके.
16 दिसंबर 2014 के बाद से पाकिस्तान में 299 लोगों को फांसी हो चुकी है.
पाकिस्तान सरकार ने पेशावर के आर्मी स्कूल पर हमले के बाद मौत की सजा पर लगी रोक हटा ली थी.
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