Monday, 30 November 2015

मैं अपने साथ ज़हर लेकर चलती थी'

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राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्था की ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार भारत की 0.35 प्रतिशत आबादी एचआईवी से पीड़ित है और राष्ट्रीय स्तर पर इसमें गिरावट आ रही है.
सबसे ज़्यादा प्रभावित लोग नगालैंड, मिज़ोरम, मणिपुर, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक जैसे प्रदेशों में हैं.
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2011 में भारत में एचआईवी/एड्स से पी़ड़ित लोगों की तादाद 20.9 लाख थी और इस संख्या का 86 प्रतिशत 15 से 49 वर्ष की आयु वर्ग का था.
एक तरफ़ तो एचआईवी प्रभावित लोगों की संख्या में गिरावट आ रही, लेकिन क्या एचआईवी पीड़ितों को लेकर लोगों की सोच में बदलाव आया है, विश्व एड्स दिवस पर यही जानने के लिए बीबीसी संवाददाता विनीत खरे ने एचआईवी पीड़ित दो लोगों से बात की.

मसून गनी लोन

मेरी उम्र 22 साल की है. मैंने 10वीं कक्षा तक पढ़ाई की है. मैं श्रीनगर में एक एनजीओ से जुड़ा हूं. मेरा ताल्लुक बेहद ग़रीब परिवार से है. मुझे बचपन से ही हीमोफ़ीलिया है.
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मैं श्रीनगर में एक अस्पताल में हीमोफ़ीलिया के इलाज के लिए जाता था. दो साल पहले मुझे वहीं से इन्फ़ेक्शन हो गया.
वर्ष 2013 में एक दिन जब मैं हीमोफ़ीलिया की रिपोर्ट मांगने गया तो अधिकारियों ने मुझे रिपोर्ट नहीं दी. अस्पताल वालों में मुझसे कहा कि आपको रिपोर्ट लेने की ज़रूरत नहीं है, आप थोड़ी देर बैठो.
मेरे साथ वहां दो लोग बैठे हुए थे. उन्होंने मुझसे कहा कि आपके शरीर में एक इन्फ़ेक्शन आ गया है और ये बात किसी को बताने की ज़रूरत नहीं है. मैंने उनसे इन्फ़ेक्शन का नाम बताने को कहा लेकिन उन्होंने मुझे नहीं बताया.
शाम को मेरे एक दोस्त का मेरे पास फ़ोन आया. उसने मुझे बताया कि मेरा खून एचआईवी पॉज़िटिव पाया गया है. उसने मुझे एचआईवी के बारे में सब कुछ बताया. मैं इतना घबरा गया कि मैंने उस दिन खाना भी नहीं खाया. मैं बहुत रो रहा था.
मैं अकेला रहना चाहता था. मेरे परिवार में किसी को भी इस बारे में पता नहीं है. मुझे उन्हें बताने की हिम्मत ही नहीं हुई. अगर मैं उन्हें ये बता देता तो वो ज़िंदा नहीं बचते. मेरे घर में वैसे ही बहुत समस्या है.
मैं एक महीने घर से बाहर रहा. मेरे घरवालों ने मुझसे मेरा हाल पूछा, लेकिन मैंने हीमोफ़ीलिया को लेकर कुछ बहाना बनाया. दरअसल मैं अपने दोस्त के घर पर ही रुका था. मुझे पहले से ही हीमोफ़ीलिया था. अब मैं एचआईवी पॉज़िटिव था. एक और जांच में मैं हेपिटाइटिस सी पॉज़िटिव पाया गया. इस कारण मैं बहुत घबरा गया था.
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मैं जीना नहीं चाहता था. जब मुझे पता चला कि एचआईवी पीड़ितों के साथ लोग भेदभाव करते हैं, मैं परेशान हो गया.
मुझे लगा कि क्या लोग मेरे साथ खाना खाएंगे. मुझे लगा कि लोग कहेंगे कि मैंने गलत काम किया है, लेकिन मेरे दोस्त ने मुझे बहुत हिम्मत दी.
उसने मुझसे कहा कि एचआईवी के बावजूद लोग आम ज़िंदगी गुजार सकते हैं. उसने कहा कि मुझे बस सावधानी बरतनी है. एक महीने बाद मैं घर वापस आया.
जब भी घरवाले मुझे कोई काम करने को कहते थे तो मैं बहाना बना देता था. मुझे एक काउंसलर ने बताया कि घाटी में एचआईवी संक्रमित हज़ारों लोग हैं.
पहले मुझे एचआईवी के बारे में कुछ पता नहीं था, लेकिन धीरे धीरे मुझे इसके बारे में पता चलने लगा. पिछले साल मैं श्रीनगर में एक एनजीओ शामिल हो गया. वहां हम एक ही प्लेट में खाना खाते हैं.
मेरा मानना है कि एचआईवी पीड़ितों के साथ भेदभाव में कोई कमी नहीं आई है.
मैं एचआईवी पीड़ितों से कहना चाहता हूं कि घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है. ये एक ऐसा इन्फ़ेक्शन नहीं है जिससे इंसान दो दिनों में मर जाएगा.
आप जितना प्यार परिवार घरवालों को देते हैं, उतना ही प्यार आपको एचआईवी संक्रमित लोगों को दें.

अंजली भगत - ट्रांसजेंडर

मैं 2012 में बलात्कार के कारण एचआईवी से पीड़ित हुई.
बलात्कार के बाद मुझे एक सरकारी अस्पताल ले जाया गया, लेकिन वहां डॉक्टरों ने इलाज करने से मना कर दिया क्योंकि ये आपराधिक मामला था. इस कारण मुझे कई समस्याओं का सामना करना पड़ा.
मुझे इलाज के लिए एक निजी अस्पताल जाना पड़ा. वहां मेरे खून की जांच से पता चला कि मैं एचआईवी पॉज़िटिव हूं.
डॉक्टरों ने मुझे कुछ नहीं बताया. उन्होंने मेरी एक दोस्त को बुलाकर पूछा कि मैं क्या काम करती हूं. डॉक्टर ने मेरी दोस्त को सरकारी आईसीडीसी सेंटर में जांच करवाने को कहा.
सरकारी अस्पताल में मुझे खून की जांच के बाद काउंसलर ने बताया कि मैं एचआईवी पॉज़िटिव हूं. जब मुझे एचआईवी के बारे में पता चला तो मैं डिप्रेशन में चली गई. मैंने अपनी जान लेने की भी कोशिश की.
अगले छह सात महीने तक मैं साथ ज़हर लेकर चलती थी. एक दिन मेरी दोस्त ने कहा कि अगर तुम्हे ज़हर खाना है तो खा लो न. फिर उसने मुझे कुछ लोगों से मिलाया जो एचआईवी पॉज़िटिव थे.
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मेरी उनसे बातचीत शुरू हो गई. मैं ऐसे लोगों से मिली जो 12 या 18 साल से दवा खा रहे हैं. तब मुझे ज़िंदगी को लेकर उम्मीद की किरण नज़र आई. मैंने फ़ैसला किया कि हम लोगों के लिए काम करेंगे.
सरकार एचआईवी को लेकर जागरुकता फ़ैलाने की कोशिश कर रही है, लेकिन धन की काफ़ी कमी है. लोगों की सोच में भी बदलाव आया है, लेकिन बहुत कम.

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