बीबीसी हिंदी की विशेष सीरीज़ #100Women के तहत अगले 15 दिनों तक ख़बरों के केंद्र में होंगी औरतें. दमदार औरतें.
हम उन औरतों के बारे में बताएंगे जो इज़्ज़त के नाम पर जान लेने को तैयार परिवार से लड़ रही हैं और अपनी पसंद के मर्द से मोहब्बत करने की जुर्रत कर रही है.
सामने लाएंगे उन औरतों की कहानी जो पति की मौत के बाद ख़ुद किसान बन गईं. वो औरत जो सोशल मीडिया पर अपनी उपस्थिति दर्ज कर रही है.
वो औरत जो शादी के मंडप पर विरोध की आवाज़ उठाने का माद्दा रखती है. वो लड़कियां जो कभी ‘नाकुशा’ कहलाती थीं और अब नाम पाकर ज़िंदगी में कुछ बनकर दिखाने की कोशिश कर रही हैं.
औरतों की ख़बरों के अलावा उन मर्दों से भी मिलवाएंगे जो औरतों के मुद्दों को अपना, सबका मामला समझते हैं और इसके लिए आवाज़ उठाने का काम कर रहे हैं.
और वो जोड़े जिनमें औरत नौकरी कर घर का ख़र्च चला रही है जबकि पति परिवार और घरेलू काम संभाल रहे हैं.
बदलते भारत की नब्ज़ पकड़ती ये सीरीज़ इन सच्ची कहानियों के साथ पेश करेगी चुनिंदा 100 दमदार औरतों की एक सूची.
बीबीसी हिंदी ने इस सूची में उन औरतों को शामिल किया है जिन्होंने नियम बदले, नए रास्ते बनाए और मिसाल क़ायम की, और कुछ नहीं तो कम से कम समाज को तो झकझोरा ही.
ये केवल इन औरतों के काम और उपलब्धियों की सूची भर नहीं है. ये हमारे समाज का एक आईना भी है.
इसमें छिपी हैं कहानियां उन औरतों की जिन्होंने उस काम को शुरू करने की हिम्मत दिखाई जिसे हमेशा से मर्दों का हक़ माना गया, उनकी फ़ितरत मानी गई.
जानिए पर्बति बरुआ को. वो महावत हैं. इसके अलावा हेतल दवे को जो भारत की पहली महिला पहलवान हैं और नेहा कृपाल जिन्होंने इंडिया आर्ट फ़ेयर की स्थापना की.
इनमें वो भी शामिल हैं जिन्होंने अपने लिए तय कर दी गई सीमाओं को चुनौती दी. कुछ ऐसा कर दिखाया जो मिसाल बन गया. जैसे कि बेबी हल्दर. उन्होंने एक घरेलू कामगार होने की आत्मकथा लिखी है.
सत्ता के ख़िलाफ़ बेख़ौफ़ आवाज़ बुलंद करती औरतों को भी हम जानेंगे. जैसे मणिपुर की वो औरतें जिन्होंने नग्न होकर सेना को विशेषाधिकार देने वाले क़ानून का विरोध किया.
सूची में उन्हें भी जगह मिली है जिन्होंने अपने काम के क्षेत्र में बुलंदियां छू लीं फिर वो चाहे खेल हो, कला, कारोबार, विज्ञान, लेखन हो या सिविल सेवा. जैसे अरांचा सांचेज़ जो विश्व की मौजूदा बिलियर्ड्स और स्नूकर चैम्पियन हैं.
#100Women सीरीज़ की कोशिश है वैसी औरतों के बारे में बताना जिनका काम ज़मीनी स्तर पर हमारे देश समाज में कुछ बदलाव रहा है.
छोटे से शुरू होकर बड़े स्तर तक पहुंचता ये बदलाव, निजी हो या सामूहिक, हौसला बढ़ाता है. देशभर में बिखरी ऊर्जा को साथ ला रहा है.
ये सीरीज़ साथ ही उन मुद्दों पर भी ध्यान खींचेगी है जिनसे औरतें अभी भी जूझ रही हैं, फिर चाहे वो 'अच्छी लड़की' की परिभाषा हो, कपड़ों को हिंसा की वजह बताने का भ्रम, माहवारी जैसे मुद्दों पर शर्म, या शादी और मां बनने के दबाव हों.
या फिर डायन बताकर मारने की प्रथा हो, आदिवासी महिलाओं के साथ अत्याचार या नौकरी या पढ़ाई ना करने की बंदिशें हों.
उम्मीद है कि आने वाले 15 दिनों में आप इस चर्चा का हिस्सा बनेंगे, बीबीसीहिंदी और अंग्रेज़ी, टीवी, रेडियो, सोशल मीडिया के माध्यम से जुड़ेंगे और अपने अनुभव हमसे साझा करेंगे.
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