Wednesday, 25 November 2015

भारत ने 26/11 से कोई सबक़ सीखा है?

मुंबई, 26/11 हमलेImage copyright
Image captionफ़ाइल फ़ोटो
सात साल पहले 26 नवंबर 2008 को हुआ चरमपंथी हमला एक ऐसी पहचान है जिसे मुंबई कभी अपने नाम नहीं करना चाहता था.
इस साल 13 नवंबर को जब पेरिस में चरमपंथी हमले हुए, उसके चंद घंटे बाद ही दुनिया भर के सुरक्षा विश्लेषकों ने इसे मुंबई जैसे हमला बताना शुरू कर दिया.
पेरिस के चरमपंथी हमलों में 130 लोगों की जानें गईं. इन हमलों ने सात साल पहले 26 नवंबर 2008 को मुंबई पर हुए हमलों की यादें ताज़ा कर दीं.
लश्कर-ए-तैयबा के प्रशिक्षित और भारी हथियारों से लैस दस चरमपंथियों ने मुंबई की कई जगहों और प्रतिष्ठित इमारतों पर हमला कर दिया था, जो चार दिन तक चला.
मुंबई हमलों में 160 से अधिक लोग मारे गए थे.
पेरिस हमलेImage copyrightReuters
पेरिस में भी रणनीति वही थी. मरने के लिए तैयार इस्लामिक स्टेट के चरमपंथियों ने एक साथ कई जगह हमले किए.
वो चार दिन मुंबईवासियों को हर साल याद आते हैं. हर साल 26 नवंबर को राजनेता और सामाजिक संस्थाएं इन हमलों में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि देते हैं. एक बहस शुरू हो जाती है कि अब तक कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर क्या प्रगति हुई है.
यह सवाल अकसर पूछा जाता है, क्या भारत ने 26/11 हमलों से सबक सीखा है? इसका सीधा जवाब है हां, सीखा है.
अगला सवाल, कि क्या उन हमलों के बाद भारत में पुलिस के काम करने के तरीकों में कोई आधारभूत बदलाव आया है. इसका जवाब है- नहीं.
mumbai_2611_attack
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मुंबई हमलों के तुरंत बाद किए गए उपायों के बावजूद भारत के शहरों में चरमपंथी हमले का ख़तरा बराबर बना हुआ है.
पूर्व गृह सचिव जीके पिल्लई की निगरानी में 26/11 हमलों के बाद कई दूरगामी कदम उठाए गए.
नवंबर, 2014 में एक अख़बार से उन्होंने कहा था, "कुछ प्रगति तो हुई है, लेकिन वास्तविकता यह है कि भारत दूसरे 26/11 को रोकने में अब सक्षम नहीं है. मैं कहूंगा कि हम 2008 के मुक़ाबले बस 40 फ़ीसद बेहतर तैयार हैं."
उन्होंने कहा था, "सबसे बड़ी दिक़्क़त पुलिस की भारी कमी और पुलिसकर्मियों की अच्छी ट्रेनिंग न होना है. इससे पुलिस तंत्र कमज़ोर होता है, जिसके कंधों पर हमले को सबसे पहले रोकने और उसका जवाब देने की ज़िम्मेदारी होती है."
मुंबई हमलेImage copyrightAFP
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पिल्लई ने कुछ भी ग़लत नहीं कहा. यह सही है कि कुछ त्वरित उपाय किए गए हैं. भारत की चरमपंथ हमलों और विमान अपहरण जैसे मामलों से निपटने के लिए बनाए गए राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) ने अपने आधार को बढ़ाया है. अब इसके चार नए क्षेत्रीय केंद्र और विभिन्न शहरों में छह नए केंद्र बनाए गए हैं.
एनएसजी के जवानों को कुछ नवीनतम उपकरणों से लैस किया गया है. उनके प्रशिक्षण में लगातार सुधार किया जाता है. एनएसजी किसी भी संभावित हमले की स्थिति से तुरंत निपटने में सक्षम है.
हालांकि स्थानीय पुलिस पूरे भारत में अभी भी सबसे कमज़ोर कड़ी है. अपर्याप्त प्रशिक्षण, काम का अधिक बोझ और आधुनिक उपकरणों की कमी से जूझते भारत में 'बीट कॉन्स्टेबल' अब भी सबसे मुश्किल हालात में काम करता है.
भारतीय पुलिसImage copyrightTHINKSTOCK
भारतीय पुलिस के आंकड़े चौंकाने वाले हैं. यहां हर एक लाख की आबादी पर औसतन 170 पुलिसकर्मी हैं, जो पश्चिम देशों के 220 के औसत के मुक़ाबले काफ़ी कम है.
काम के बोझ के नीचे दबे स्थानीय पुलिसकर्मी कई तरह के काम करते हैं. अक्सर ट्रैफ़िक नियंत्रण और वीआईपी सुरक्षा भी उन्हीं के जिम्मे आती है.
महाराष्ट्र जैसे कुछ राज्यों ने चरमपंथी हमलों के मुक़ाबले के लिए फ़ोर्स 1 जैसी कमांडो टीमें तैयार की हैं. लेकिन स्थानीय पुलिस बल की कार्यस्थितियां सुधारने का सवाल नज़रअंदाज़ कर दिया है जिन पर चरमपंथी हमले रोकने का पूरा दारोमदार रहता है.
राष्ट्रीय स्तर पर देश के पुलिस थानों को एक डाटाबेस नेटवर्क के ज़रिए जोड़ने की कोशिशें धीमी गति से चल रही हैं.
भारतीय पुलिसImage copyrightAnagha Sakhare.
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क्राइम और क्रिमिनल ट्रैकिंग नेटवर्क एंड सिस्टम प्रोजेक्ट (सीसीटीएनएस) नाम के इस प्रोजेक्ट के तहत तीन साल पहले ही सभी पुलिस थाने जोड़ना था. लेकिन इस पर काम अब भी जारी है.
मौजूदा बैंकिंग, वित्त और परिवहन व्यवस्थाओं के माध्यम से चरमपंथी अभियानों की निगरानी को संभव बनाने वाली नेटग्रिड परियोजना को धरातल पर आने में अब भी बरसों लगेंगे.
पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम की पसंदीदा परियोजना नेशनल काउंटर टेररिज़्म सेंटर भी राज्य सरकारों की आपत्तियों के चलते बंद है. इस पर 640 अरब रुपए की लागत आनी थी.
हालांकि तटीय सुरक्षा के मामले में कुछ प्रगति हुई है. नौसेना ने तटीय सुरक्षा के लिए कमांडर और कंट्रोल केंद्र के रूप में मुंबई, विशाखापत्तनम, कोच्ची और पोर्ट ब्लेयर में संयुक्त अभियान केंद्र (जेओसी) स्थापित किए हैं, जो पूरी तरह सक्रिय हैं. पिछले कुछ सालों में तटों पर नौसेना, तटरक्षक बल और समुद्री पुलिस की गश्त काफ़ी बढ़ी है.
भारतीय नौसैनिक पोत विक्रमादित्यImage copyrightReuters
केंद्र और राज्य सरकारों की क़रीब 15 एजेंसियों के बीच समन्वय में बहुत सुधार आया है. ये सभी तटीय राज्यों में नौसेना के नियमित 'अभ्यासों' से हुआ है.
नौसेना के मुताबिक़ 2008 से अब तक देश भर में ऐसे 100 से अधिक अभ्यास हो चुके हैं. पूरे तट की निर्बाध निगरानी के लिए 74 स्वचालित पहचान प्रणाली (एआईएस) रिसीवरों की श्रृंखला तैनात है.
कहा जा सकता है कि परिणाम मिले-जुले हैं. भारत को मुंबई जैसे हमले रोकने के लिए अपनी ख़फिया सूचनाएं जुटाने की क्षमता बढ़ानी होगी और नई तकनीक का समावेश करना होगा.
कसाब पोस्टरImage copyrightAP
ज़रूरत इसकी है कि अपनी क्षमताएं लगातार बेहतर की जाएं और केवल एनएसजी नहीं बल्कि सभी एजेंसियों को आधुनिक चरमपंथ-विरोधी उपकरणों से लैस किया जाए. इस मोर्चे पर भारत को अभी भी काफ़ी कुछ करना है.

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